संविधान निर्माण और बीएन राव साहब

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21वी सदी के 26वे वर्ष की 26 तारीख को हमारा देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। आप सबको बधाई और ढेरों शुभकामनाएं

आप सबको मालूम है कि 26 जनवरी 1950 को हमारे देश में संविधान लागू हुआ था। मैं आपको संविधान निर्माण के कुछ अनुछुये पहलुओं के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसे हम सत्यकथा कह सकते हैं,,,, इस सत्यकथा में विवाद नहीं होना चाहिए,,,

संविधान निर्माण की मांग

वैसे तो 1934 में संविधान सभा के गठन की मांग एम एन राय ने की थी जो क्रांतिकारी नेता थे, दार्शनिक और विचारक थे और बाद मे कांग्रेस ने भी समर्थन दिया,,,,

पहली बैठक

लेकिन इसकी पहली बैठक,,, 1946 में हुई,,, पहले संविधान सभा का चुनाव जुलाई १९४६ में हुआ, 389 सदस्य चुने गये, इनमें से 7 सदस्यों की कमेटी का गठन किया गया और ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डा अंबेडकर बनाये गये, संविधान को तैयार करने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे, 26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकार कर लिया गया और ठीक 2 महीने बाद अंततः 26 जनवरी 1950 को लागू हो गया। संविधान को लिखने का काम प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने किया था।

संविधान निर्माण के मुख्य तथ्य

संविधान के निर्माण से जुड़े कुछ मुख्य तथ्यों या मुख्य बिंदुओं के विषय में देशवासियों को जानना जरुरी है आज गणतंत्र दिवस के दिन, जिसे हम राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मना रहे हैं इसके अनछुए पहलुओं के बारे में बताने जा रहा हूँ….

असली नायक

भले ही डॉ. बी.आर. अंबेडकर साहब को भारतीय संविधान का ‘जनक’ या ‘Architect कहा जाता है। लेकिन पर्दे के पीछे वास्तविक हीरो बी एन राव साहब थे

बीएन राव

बी. एन. राव साहब का पूरा नाम बेनेगल नरसिंह राव था। वे संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार थे, इन्होंने ही संविधान का पहला कच्चा मसौदा तैयार किया, जिस पर संविधान सभा ने विचार-विमर्श कर अंतिम संविधान बनाया; राऊ साहब संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, बल्कि एक सिविल सर्वेंट और न्यायविद थे, इन्होंने लगभग ६० देशों के संविधानों का अध्ययन किया और संविधान सभा को महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया,

कच्चा मसौदा

उन्होंने 246 अनुच्छेदों का एक विस्तृत कच्चा मसौदा तैयार किया, जो संविधान निर्माण का आधार बना, दुनिया के कई देशों के‌ संविधान विशेषज्ञों से सलाह लिया, परामर्श भी किया।
इन्होंने ही संविधान के कठिन या कहें कि जटिल पहलुओं पर डॉ. अंबेडकर साहब और संविधान सभा को बताया और समझाया, डॉ. अंबेडकर ने इनके योगदान को स्वीकार भी किया था।

ड्राफ्टिंग कमेटी के अंबेडकर अध्यक्ष

बीएन राउ साहब के संविधान के कच्चे मसौदे को ही ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष डा अंबेडकर ने संवारा और अंतिम रूप दिया या कहें कि फायनल ड्राफ्ट तैयार किये। इसलिए, बी.एन. राव को ‘संविधान का वास्तुकार’ कहा जाता है, जबकि डॉ. अंबेडकर ‘संविधान के जनक’ कहलाते हैं, दोनों का योगदान महत्वपूर्ण था और दोनों एक दूसरे के पूरक भी थे।

हर समस्या का हल

बी एन राव साहब एक ऐसी हस्ती थे जो जब भी कोई समस्या आती थी उसका हल उनके पास रहता था ।

“India Constitution in the making ” नाम के एक किताब में डॉ राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं कि भारत की भावी पीढ़ियां, बीएन राव साहब को मुख्य संविधान निर्माता के रूप में जानेंगी ।

भरपूर इज्जत और सम्मान

संविधान का निर्माण बीएन राउ साहब के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था। , स्वतंत्रता संग्राम के विषय में जानकारी रखने वाले इतिहासकार, डॉ राजेंद्र प्रसाद , जवाहरलाल नेहरू और बीएन राव साहब को संविधान त्रिमूर्ति भी अपनी लेखों में लिखे हैं, इस त्रिमूर्ति शब्द को यदि geometry से समझे,, तो बीएन राव साहब उस त्रिमूर्त के आधार थे ।

राजेन्द्र प्रसाद के साथ बैठक

डॉ राजेंद्र प्रसाद पूरे संविधान को समझने के लिए बीएन राव साहब से अलग से शिमला में मिलना चाहते थे उन्होंने इसके लिए बीएन राउ को पत्र भी लिखे थे और शिमला में मीटिंग हुई भी, जो तीन दिनो तक चली,
कुछ दिनों बाद राव साहब ने इसी मीटिंग का संदर्भ देते हुवे डॉ राजेंद्र प्रसाद को एक पत्र लिखा था कि संविधान सभा में कुछ लोग पद तो ले लिए हैं लेकिन काम कुछ नहीं करते हैं जो काम मैं करता हूँ उसपर टीका टिप्पणी और समय बर्बाद करते हैं उनकी यह नाराजगी डॉ भीम राव अम्बेडकर के प्रति थी इस पत्र में उन्होंने लिखा कि संविधान के मुख्य सलाहकार का पद, मैंने अपनी शर्तों पर लिया और यह पूर्णतः “स्वान्तः सुखाय” है मेरे तरफ़ से यह कार्य अब पूर्ण हो चुका है इस लिए अब मैं इस कार्य से मुक्ति चाहता हूँ ।

म्यांमार का संविधान

बता दूं कि राव साहब ने बर्मा जो आज म्यांमार कहलाता है वहां का भी संविधान बनाये थे बर्मा के तत्कालीन प्रधानमंत्री दिल्ली आकर बीएन राव साहब से अपने देश के संविधान निर्माण के लिए निवेदन किये थे, बीएन राव जी ने उनकी मदद की,, 24 सितम्बर 1947 को बर्मा में राव साहब निर्मित संविधान को लागू भी कर लिये

समय मांगते थे बड़े नेता

डॉ राजेंद्र प्रसाद, नेहरू जी, श्यामाप्रसाद मुकर्जी, सरदार पटेल,,, शास्त्री जी,,,, ये सब बीएन राव साहब का बहुत सम्मान करते थे,,,, उनसे मिलने के लिए समय माँगा करते थे,,, यह बीएन राव साहब को अंबेडकर का क्लर्क कहने वालों के मुँह पर करारा तमाचा था,

एक बात और, संविधान को समझने के लिए नेहरू जी और डा राजेन्द्र प्रसाद जी ने बी आर अंबेडकर को नहीं चुना था, उन्होंने बीएन राव को चुना था ।

भारत कामनवेल्थ का सदस्य

आज भारत कॉमनवेल्थ का सदस्य है इसमें केवल बीएन राव का योगदान है पूरी संविधान सभा इसके ख़िलाफ़ थी और इसे ग़ुलामी का प्रतीक कह कर खतम करना चाहती थी, लेकिन बीएन राव साहब ने उसकी बारीकियों और भविष्य के दुष्परिणामों को ठीक से संविधान सभा को समझाये, फिर जाकर संविधान सभा कामनवेल्थ की सदस्यता के लिए तैयार हुई ।

हैदराबाद रियासत

जब हैदराबाद के निजाम ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और भारत और पाकिस्तान दोनों में मिलने से इंकार कर दिया, साथ ही अपने बचाव के लिए उसने संयुक्त राष्ट्र में मुक़दमा भी कर दिया तो वो बीएन राव ही थे जिन्होंने ए. रामास्वामी मुदलियार को क़ानूनी सलाह देकर भारत का बचाव करने के लिए संयुक्त राष्ट्र भेजा और हैदराबाद का निजाम वह मुक़दमा हार गया ।

सरदार पटेल ने अपने भाषण में इसका ज़िक्र किया है कि किस प्रकार बीएन राव की सलाह और प्रयास से ही, ऑपरेशन पोलो और यूनाइटेड नेशन में हम जीत पाए और अंत में ,,,,, हैदराबाद रियासत को भारत में विलय करा ही लिया गया।

ऑपरेशन पोलो के विषय में बता दूं कि सितंबर 1948 में भारतीय सेना द्वारा शुरू किया गया एक सैन्य अभियान था, इस अभियान के बाद ही हैदराबाद रियासत को भारत संघ में मिला लिया गया था।

जम्मू कश्मीर रियासत का विलय

जम्मू कश्मीर के विलय में भी बीएन राव साहब का महत्वपूर्ण योगदान था, हालांकि वे किसी राज्य को विशेष दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे,,, ये धारा 370 का विरोध करते रहे, लेकिन इनके विरोध को दरकिनार करते हुए नेहरू की जल्दबाजी में जम्मू कश्मीर रियासत से समझौते कर लिये, ये समझौता इंडिया एक्ट 1935 के अनुसार हुआ था।

असम बचाये बीएन राव

एक बात और बता दूं कि आज असम भारत में है इसका पूरा श्रेय बीएन राव साहब को जाता है क्योंकि जब विभाजन हो रहा था उस समय पाकिस्तान ने असम को अपना हिस्सा बताया लेकिन चूंकि बीएन राउ साहब लंबे समय तक असम में मुख्य सचिव रहे थे इसलिए असम से उनका विशेष लगाव था और अपने सार्थक प्रयास से मोहम्मद अली जिन्ना और तत्कालीन वायसराय माउंटबेटेन से बात करके असम को भारत का ही हिस्सा रखने में सफल रहे ।


युवा छात्र राव को जानें

आज के छात्रों और युवाओं को बेनेगल नरसिंह राव के विषय में खूब पढ़ना चाहिए क्योंकि भारत सरकार तो अंबेडकर को संविधान निर्माता बना कर बीएन राव साहब को भूल चुकी है, लेकिन इतिहास के पन्नो में आज भी इन विद्वान व्यक्तित्व का संदेश जीवंत हैं जब आप उनको जानेंगे, पढ़ेंगे, तो ख़ुद अंबेडकर की संविधान निर्माण की झूठी कहानी को समझ जाएँगे, इस वोट बैंक की राजनीति को भी समझ जाएँगे और कहेंगे कि असली संविधान निर्माता तो बीएन राउ साहब ही थे।


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