मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में अंतर

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[ अजय कुमार ]

गुजरात मुख्यमंत्री रहते ऑनलाइन सेंसरशिप के विरोध में अपना ट्विटर डीपी काला कर लेने वाले मोदीजी प्रधानमंत्री बनकर सबको ब्लॉक करा रहे हैं!

दूसरा सच यह भी है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले, यूपीए सरकार के जिन नीतियों का विरोध करते थे, उन्हीं नीतियों को पीएम बनने के बाद, लागू करने में, उन्हें कभी ना तो हिचकिचाहट हुई और ना कभी उसका स्पष्टीकरण देना उचित समझे।
आनलाइन सेंसरशिप के विरोधी थे मोदी
जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए, ऑनलाइन सेंसरशिप के विरोध में अपना ट्विटर डीपी काला कर लिया था। पत्रकार और जागरूक जनता, प्रधानमंत्री से अपील करना चाहते हैं कि वे सही कदम उठाएं और अपने आईटी व सूचना-प्रसारण मंत्रालय को उस सेंसरशिप ढांचे को खत्म करने का निर्देश दें, जिसे उनकी सरकार ने खड़ा किया है।
सेंसरशिप का कानून पहले भी था
भारत में बड़े पैमाने पर सेंसरशिप का एक पूरा ढांचा पहले से मौजूद है, और नए नियम इसे और मजबूत कर रहे हैं। हम देख रहे हैं कि एक्स (ट्वीटर), इनस्टाग्राम और फेसबुक पर अकाउंट और पोस्ट बड़े पैमाने पर हटाए जा रहे हैं, इसी नये आईटी ढांचे के कारण, लोकतंत्र पर ही आक्रमण कर दे रहे हैं।
यह सेंसरशिप ढांचा कैसे काम करता है
बेहद तेज़ी से कार्रवाई अर्थात् पोस्ट हटाने का आदेश 3 घंटे के भीतर लागू करना होता है। (सरकार इसे 1 घंटे तक लाने पर विचार कर रही है), इसका मतलब है कि चुनौती देने का कोई समय ही नहीं मिलता। यह दुनिया में सबसे कम समयसीमा है, हर आदेश ‘आपातकाल’ जैसा बन जाता है।

इसका असर प्लेटफॉर्म को सोचने का समय नहीं देते और बिना किसी सूचना के सीधे कंटेंट हटाते हैं।
दायरा लगातार बढ़ रहा है
अब किन कारणों से पोस्ट हटाई जा सकती है, इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। नए नियमों के तहत ऐसे ट्वीट भी हटाए जा सकते हैं जैसे न्यूज़ वेबसाइट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और यहां तक कि स्ट्रीमिंग सेवाएं भी आईटी नियमों के दायरे में लाई जा रही हैं।

इसका सीधा प्रभाव व्यंग्य, पत्रकारिता और राजनीतिक आलोचना, सब सेंसर हो रही है।
चुनौती देना मुश्किल
जब रोज़ाना 160 तक टेकडाउन आदेश आते हैं (जैसा कि एक्स ने कोर्ट में बताया), तो कितनों को चुनौती दी जा सकती है? प्लेटफॉर्म सरकार से टकराने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें भारत में अपना कारोबार भी चलाना है। नियम बार-बार बदलते रहते हैं, एक नियम कोर्ट में चुनौती पाता है, तब तक दूसरा आ जाता है।
आदेश देने का सिस्टम विकेंद्रीकृत
‘सहयोग पोर्टल’ जैसे सिस्टम के जरिए कई सरकारी एजेंसियां सीधे प्लेटफॉर्म को आदेश भेज सकती हैं। 33 राज्य, 7 केंद्रीय एजेंसियां और 72 कंपनियां इसमें शामिल हैं।
यूज़र को कोई नोटिस नहीं मिलता
आदेश सार्वजनिक नहीं होते। आरटीआई का जवाब नहीं मिलता। फैसले गुप्त तरीके से होते हैं। सरकार की न कोई जवाबदेही, न पारदर्शिता।

निजी डेटा पर निगरानी रखी जाती है, आईटी एक्ट की धाराओं 69, 70बी और 75 के तहत सरकार सोशल मीडिया यूज़र्स का डेटा मांग सकती है। अब तो लोग खुद ही बोलने से डरने लगते हैं, इससे सेल्फ सेंसरशिप बढ़ती है।
कानून बनाने की प्रक्रिया कमजोर
नए नियमों पर सिर्फ 15 दिन में सुझाव मांगे जाते हैं। लागू करने का समय कभी-कभी 10 दिन ही होता है। संसद को दरकिनार कर नियम बनाए जा रहे हैं।

फिलहाल देश में आधिकारिक आपातकाल तो नहीं है किन्तु मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिशों को अघोषित आपातकाल की श्रेणी में रखा जा सकता है, यह भी कहा जा सकता है कि देश की जनता को जो धीमी जहर दी रही है, उसकी मात्रा अनुपातिक और अनापेक्षित तौर पर बढ़ चुकी है।


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