[ अजय कुमार ]

{ सबरीमाला मंदिर, केरल के पतनमथिट्टा जिले में पेरियार टाइगर रिजर्व की पहाड़ियों में पंपा नदी के किनारे स्थित, भगवान अय्यप्पा का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। भगवान अय्यप्पा, शिव और मोहिनी के पुत्र है, जिन्हें ‘शास्ता’ भी कहा जाता है }
09-जजों की संविधान पीठ, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले की सुनवाई कर रही है…
सितंबर 2018 में, सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाकर उन्हें प्रवेश की अनुमति दी थी।
- 1950 में स्थापना के बाद से सुप्रीम कोर्ट में 09 जजों की बेंच अब तक 17 बार…
- यह सबसे बड़ी संवैधानिक पीठों में से एक है…
- 17वीं बार सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाला फ़ैसला ग़लत था, इसलिए यह बेंच गठित है…
- यह सुनवाई केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक मामलों में अदालत के हस्तक्षेप के दायरे को भी तय करेगी…
फैसला गलत था : केन्द्र सरकार
सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार ने कल मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि 2018 का वह फ़ैसला, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई, ग़लत था और इसे एक ग़लत क़ानून घोषित किया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए एडिशनल जनरल तुषार मेहता ने 09-जजों की बेंच के सामने दलील दी कि 2018 के फ़ैसले पर क़ानूनी आधार पर फिर से विचार करने और उसे पलटने की ज़रूरत है।
विराजमान देवता की अनोखी प्रवृत्ति : उम्र के आधार पर फैसला था
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सबरीमाला फ़ैसले में व्यक्त किए गए इस विचार पर उन्हें सख़्त आपत्ति है कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक अस्पृश्यता के बराबर है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन करता है। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि महिलाओं के प्रवेश पर यह रोक केवल उम्र के आधार पर थी। उन्होंने आगे कहा कि अयप्पा मंदिरों में महिलाओं का पूरी तरह से बहिष्कार नहीं किया जाता है और सबरीमाला में यह रोक वहाँ विराजमान देवता की अनोखी प्रकृति के कारण है।
सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि पितृसत्ता और लैंगिक रूढ़ियों की पश्चिमी अवधारणाओं को भारत के सभ्यतागत मूल्यों को समझे बिना भारत पर आंख मूंदकर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
धर्मों के बीच समानता : लिंग का मुद्दा नहीं
अनुच्छेद 25 के तहत गारंटीकृत समान अधिकार के संबंध में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इसे धर्मों के बीच समानता के अर्थ में समझा जाना चाहिए और अनुच्छेद 25 के तहत लिंग का मुद्दा नहीं उठता है।
2018 का फ़ैसला पांच जजों की बेंच द्वारा 4:1 के बहुमत से सुनाया गया। इस फैसले में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में यह मानते हुए प्रवेश की अनुमति दी थी कि भक्ति को लिंग-भेदभाव के अधीन नहीं किया जा सकता।
धार्मिक प्रथाओं में न्यायालयीन हस्तक्षेप का दायरा
अपनी दलीलों के दौरान, सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि संविधान पीठ के समक्ष प्रस्तुत यह मामला संवैधानिक प्रश्नों के एक व्यापक समूह से संबंधित है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या और धार्मिक प्रथाओं के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से जुड़े प्रश्न शामिल हैं।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि केंद्र सरकार की दलीलों को केवल सबरीमाला मामले के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए, जिसे उन्होंने एक ‘अद्वितीय’ मामला बताया। उनके अनुसार, कोर्ट अभी कानून और न्यायिक नीति के बुनियादी सवालों की जांच कर रहा है, जिनका असर किसी एक विवाद से कहीं ज़्यादा हो सकता है।
सॉलिसिटर जनरल आगे बोले…
मैं सबरीमाला वाले हिस्से को नहीं छू रहा हूं, मैं उससे अलग तरीके से निपटूंगा। यह अपने आप में एक अनोखा मामला है। अभी, मेरे लॉर्ड्स कानून के उन सवालों और न्यायिक नीति की जांच कर रहे हैं, जिन्हें मेरे लॉर्ड्स लागू करेंगे। इसलिए मेरे लिए यह बेहतर होगा कि मैं किसी एक खास, अनोखे मामले से प्रभावित न होऊं। हालांकि, यह मेरा ही मामला है, जिसे गलत तरीके से तय किया गया और जिसे एक से ज़्यादा कारणों से गलत कानून घोषित किया जाना चाहिए।”
बेंच केवल 07 संवैधानिक सवालों तक सीमित
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि वह सबरीमाला फैसले के गुण-दोष में नहीं जाएगी और खुद को अपने सामने मौजूद 7 संवैधानिक सवालों तक ही सीमित रखेगी।
नवंबर, 2019 में 05 जजों की एक बेंच ने, जो सबरीमाला फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, कुछ मुद्दों को 09 जजों की बेंच के पास भेज दिया। बेंच ने माना कि शिरूर मठ मामले में 07 जजों की बेंच के फैसले और दरगाह कमेटी मामले में 05 जजों की बेंच के फैसले के बीच कळ विसंगतियां थीं।
07 सवाल…
09 जजों की बेंच ने बाद में 07 सवाल तय किए, जो इस प्रकार हैं –
- (i) भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?
- (ii) भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और भारत के संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच क्या आपसी संबंध है?
- (iii) क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा, भारत के संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन हैं?
- (iv) भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और विस्तार क्या है, और क्या इसका मतलब इसमें संवैधानिक नैतिकता को शामिल करना है?
- (v) भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 में बताई गई किसी धार्मिक प्रथा के संबंध में न्यायिक पुनर्विचार का दायरा और विस्तार क्या है?
- (vi) भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) में आए वाक्यांश “हिंदुओं के वर्ग” का क्या अर्थ है?
- (vii) क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, पीआईएल दायर करके उस धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?
अदालतों का काम धार्मिक प्रथाएं तय करना नहीं
सोमवार को हुई बहस की शुरुआत करते हुए एसजी तुषार मेहता ने बेंच को अनुच्छेद 25 और 26 से संबंधित संविधान सभा की बहसों से अवगत कराया। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायिक रूप से विकसित ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं’ की
कसौटी दोषपूर्ण थी, और यह अदालतों का काम नहीं है कि वे किसी भी धार्मिक प्रथा की अनिवार्यता तय करें।
केंद्र सरकार के विधि अधिकारी ने आगे कहा कि संविधान के अनुसार, अनुच्छेद 25 (2) (बी) के तहत किसी भी धर्म में सुधार के लिए कानून बनाना विधायिका का काम था।
09 जजों की संवैधानिक पीठ –
- सीजेआई सूर्यकांत,
- जस्टिस बीवी नागरत्ना,
- जस्टिस एमएम सुंदरेश,
- जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह,
- जस्टिस अरविंद कुमार,
- जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह,
- जस्टिस प्रसन्ना बी वराले,
- जस्टिस आर महादेवन
- जस्टिस जॉयमाल्य बागची
की बेंच इस संदर्भ पर सुनवाई कर रही है, 22 अप्रैल को सुनवाई निरंतर जारी रहेगी।