[ अजय कुमार ]
बीजेपी के घोषणा पत्र में 1950 के कानून का इस्तेमाल कर ”अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज़’ करने का वादा, ताकि स्थानीय लोगों की जमीन, विरासत और सम्मान की रक्षा हो सके”।
गुवाहाटी/नई दिल्ली :
बीजेपी के घोषणा पत्र ने 1950 के इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट के इस्तेमाल को लेकर फिर से बहस शुरू कर दी है, यह कानून कई दशकों तक इस्तेमाल नहीं हुआ था।
9 अप्रैल के चुनाव के लिए पार्टी का 31 बिंदुओं वाला घोषणा पत्र जारी करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि “बांग्लादेशी मियां” को बाहर निकालने के लिए इस कानून का सख्ती से इस्तेमाल किया जाएगा, “मियां” शब्द बंगाली बोलने वाले मुसलमानों के लिए अपमानजनक माना जाता है।
1950 का कानून अब फिर से लागू होगा…
सरमा ने बताया कि बीजेपी की घोषणा पत्र में कहा गया है कि 1950 के कानून को लागू कर असम के स्थानीय लोगों की जमीन, विरासत और सम्मान की रक्षा की जाएगी, ताकि “अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज हो सके” और “अवैध प्रवासियों के कब्जे से ज़मीन का हर इंच मुक्त कराया जा सके.”
यह कानून जनवरी 1950 में पहले अध्यादेश के रूप में लाया गया था और उसी साल मार्च में इसे कानून बना दिया गया, लेकिन बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के कारण इसका इस्तेमाल बंद हो गया और यह कई दशकों तक निष्क्रिय पड़ा रहा।
असम कैबिनेट ने पुनः मंजूरी दी…
पिछले साल असम कैबिनेट ने जिला अधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को 1950 के कानून के तहत अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को मंजूरी दी थी।
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा था, “हमारे जिला अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जिस भी व्यक्ति पर शक हो या जिसे ट्रिब्यूनल विदेशी घोषित कर चुका हो, उसे तुरंत निष्कासन का आदेश दिया जाए. इसके बाद पुलिस या बीएसएफ उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने की कार्रवाई करेगी।”
यह कानून क्या कहता है, इसे क्यों लाया गया था
यह कानून केंद्र सरकार को अधिकार देता है कि वह “कुछ प्रवासियों” या “किसी वर्ग के लोगों” को असम से बाहर जाने का आदेश दे सकती है, अगर केंद्र सरकार को लगता है कि उनका वहां रहना “भारत के आम लोगों के हित या असम के किसी वर्ग या अनुसूचित जनजाति के हित के खिलाफ है।
हालांकि, इस कानून में शरणार्थियों के लिए छूट दी गई है इसमें कहा गया है कि यह उन लोगों पर लागू नहीं होगा जो दंगों या अशांति के कारण अपने घर से भागकर उस इलाके से आए थे, जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
इस कानून में यह भी प्रावधान है कि जो व्यक्ति निष्कासन आदेश का पालन नहीं करेगा या ऐसे व्यक्ति को छिपाएगा, उसे तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है
कानून का उद्देश्य
कानून के उद्देश्य और कारणों में कहा गया है कि पिछले कुछ महीनों में पूर्वी बंगाल के बहुत ज्यादा लोगों के असम आने से “गंभीर स्थिति” पैदा हो गई थी।
बड़ी संख्या में लोगों के आने से राज्य की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है और कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो रही है, इसलिए इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार को जरूरी अधिकार देने के लिए यह कानून लाया गया।
एसडीएम को था बाहर निकालने का अधिकार

जुलाई 1952 में संसद में दिए गए जवाब में कहा गया था कि अगर पुलिस की रिपोर्ट में किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त आधार मिलता है, तो जिला मजिस्ट्रेट या सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट उसे बाहर निकालने का आदेश दे सकते हैं।
इस कानून को लागू करने के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं बनाई गई थी, जिला और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट को ही कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया था।
यह कानून क्यों पास किया गया
इस कानून से पहले 1950 का इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) ऑर्डिनेंस लागू था, जो 6 जनवरी 1950 से 1 मार्च 1950 तक प्रभाव में रहा, 1 मार्च 1950 को नया कानून लागू हुआ।
यह बिल पहली बार दिसंबर 1949 में उस समय के रेल और परिवहन मंत्री एन. गोपालस्वामी अय्यंगार ने संविधान सभा (विधायी) में पेश किया था, लेकिन समय की कमी के कारण इसे पास नहीं किया जा सका. इसके बाद एक ऑर्डिनेंस जारी किया गया।
फरवरी 1950 में बिल पर चर्चा के दौरान अय्यंगार ने कहा कि ये प्रावधान “असम की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी” हैं क्योंकि ईस्ट पाकिस्तान से असम में “अवांछित प्रवासियों” की संख्या बढ़ रही थी।
1.5-2 लाख अवांछित प्रवासी बनाम 5 लाख…
अय्यंगार ने संसद को बताया कि 1949 के बीच तक असम में लगभग 1.5 लाख से 2 लाख “अवांछित प्रवासी” थे, लेकिन बाद में यह संख्या बढ़कर लगभग 5 लाख हो गयी ।
उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, 1948 के अंत में असम सरकार ने इस बढ़ती संख्या को लेकर केंद्र सरकार को चेतावनी दी थी।
एक समाधान के तौर पर असम और ईस्ट पाकिस्तान के बीच परमिट सिस्टम लागू करने पर विचार किया गया था, लेकिन सरकार को लगा कि इससे उन बहुत से लोगों की आवाजाही पर रोक लग जाएगी, जिन्हें अपने रोज़मर्रा के काम के लिए ईस्ट पाकिस्तान और असम या पश्चिम बंगाल के बीच आना-जाना पड़ता है.
कानून में वैकल्पिक प्रावधान
इसके बाद इस कानून को एक वैकल्पिक समाधान के रूप में लाया गया, अय्यंगार ने संसद को भरोसा दिलाया कि ऑर्डिनेंस लागू होने के बाद न सिर्फ प्रवासियों की संख्या कम हुई, बल्कि “काफी संख्या में मुसलमान जो असम आए थे, वे अब वापस ईस्ट बंगाल अपने घर लौट रहे हैं। अगर इस कानून को उसी भावना से लागू किया गया, जिसके लिए इसे बनाया गया है, तो कुछ समय में इस समस्या का अंत हो जाएगा.”
इसे क्यों बंद किया गया…
इस कानून को बंद किए जाने का कारण 8 अप्रैल 1950 को जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच हुए समझौते से जुड़ा माना जाता है।
नेहरू-लियाकत समझौते या दिल्ली समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने अल्पसंख्यकों को धर्म की परवाह किए बिना “पूरी नागरिक समानता” देने पर सहमति जताई थी।
इस समझौते में यह भी कहा गया था कि ईस्ट बंगाल, वेस्ट बंगाल, असम और त्रिपुरा से आने-जाने वाले लोगों के लिए, जहां सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, “आवाजाही की स्वतंत्रता और यात्रा के दौरान सुरक्षा” दी जाएगी।
तब नेहरू ने कहा कि फिलहाल “इस कानून के तहत कोई कार्रवाई करना सही नहीं होगा।”
कितने लोगों को बाहर किया गया
जुलाई 1952 में सरकार ने लोकसभा में बताया कि यह कानून मार्च 1950 में लागू हु लागू हुआ था और 8 अप्रैल 1950 तक प्रभाव में रहा, लेकिन 8 अप्रैल 1950 के प्रधानमंत्री समझौते के तहत इसे रोक कर रखा गया।
सरकार ने बताया कि ऑर्डिनेंस और इस कानून के तहत असम से कुल 354 प्रवासियों को बाहर किया गया था।
गतवर्ष इस कानून की याद आयी
पिछले साल नवंबर में इस कानून का इस्तेमाल किया गया था, जब सोनितपुर जिला प्रशासन ने ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किए गए पांच लोगों को 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का आदेश दिया था, दिसंबर में नगांव जिले के 15 लोगों को भी बाहर भेजने का आदेश दिया गया था।
इस साल जनवरी में सरमा ने एक्स पर पोस्ट कर बताया था कि सुबह-सुबह 14 अवैध घुसपैठियों को बाहर भेजा गया, कुछ नए थे और कुछ पुराने परेशानी पैदा करने वाले थे।