भारत का शरीर पतला हो जायेगा और दवा उद्योग का जेब मोटा

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[अजय कुमार]

मुंबई/नई दिल्ली :
भारत की सस्ती वज़न घटाने वाली दवाएँ मोटापे के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई का स्वरूप बदल सकती हैं, लेकिन दवा कंपनियों में मिलावट, मुनाफाखोरी ना हो तभी संभव होगा।

शुक्रवार 20 मार्च को, डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क की वज़न घटाने वाली दवाओं वेगोवी, ओज़ेम्पिक और सेमाग्लूटाइड का पेटेंट हमारे देश में खत्म हो जाएगा।
जेनेरिक दवाओं के लिए अच्छा समय
इससे घरेलू दवा कंपनियों को सस्ती या जेनेरिक दवाएं बाज़ार में लाने की छूट मिल जाएगी। इससे कंपनियों के बीच ज़बरदस्त मुकाबला शुरू हो जाएगा, जिससे दवाओं की कीमतें आधी से भी कम हो सकती हैं। इसका फ़ायदा भारतीयों को मिलेगा और दूसरे देशों के लोगों को भी।

इन्वेस्टमेंट बैंक जेफ़रीज़ ने इसे भारत के लिए एक संभावित “जादुई गोली वाला पल” बताया है। बैंक का अनुमान है कि अगर कीमतें सही रखी जाएं और लोग इसे अपनाएं, तो सेमाग्लूटाइड का घरेलू बाज़ार आखिरकार एक अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।

जानकारों का अनुमान है कि कुछ ही महीनों में करीब 50 ब्रांडेड सेमाग्लूटाइड जेनेरिक दवाएं बाज़ार में आ जाएंगी – भारत के बेहद प्रतिस्पर्धी दवा उद्योग में यह एक जाना-पहचाना चलन है। जब 2022 में डायबिटीज़ की दवा सिटाग्लिप्टिन का पेटेंट खत्म हुआ, तो एक महीने के अंदर ही इसके करीब 30 ब्रांडेड वर्जन बाज़ार में आ गए थे और एक साल के अंदर यह संख्या बढ़कर लगभग 100 हो गई थी।
अमीर भारतीयों की वजह से वज़न घटाने वाली दवाओं की मांग में ज़बरदस्त उछाल
भारत का दवा उद्योग, जिसकी मौजूदा कीमत करीब 60 बिलियन डॉलर (5.56 अरब रुपये) है, यह 2030 तक दोगुना होने की उम्मीद है। इसका एक बड़ा हिस्सा जेनेरिक दवाओं पर आधारित है – ऐसी निर्माण क्षमता है जो अब सेमाग्लूटाइड को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा का मंच तैयार कर रही है। जो दवा अब तक एक महंगी इंजेक्शन थी और ज़्यादातर अमीर मरीज़ों तक ही सीमित थी, वह जल्द ही आम लोगों के लिए भी आसानी से उपलब्ध हो सकती है।

शुरू में डायबिटीज़ के इलाज के लिए बनाई गई इन दवाओं को अब वज़न घटाने के मामले में गेम चेंजर माना जा रहा है, इनके नतीजे इतने असरदार हैं कि पहले के कुछ ही इलाज इनकी बराबरी कर पाते थे। सेमाग्लूटाइड दवाओं के उस वर्ग से संबंधित है जिसे जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट के नाम से जाना जाता है, ये दवाएँ एक ऐसे हार्मोन की तरह काम करती हैं जो भूख और ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है।
पेट भरा है महसूस होगा
इंसुलिन के स्राव को बढ़ाकर और पेट के खाली होने की गति को धीमा करके, ये दवाएँ लोगों को जल्दी पेट भरा हुआ महसूस कराती हैं और यह एहसास ज़्यादा समय तक बना रहता है। शुरू में डायबिटीज़ के लिए बनाई गई ये दवाएँ अब दुनिया भर में वज़न घटाने के सबसे ज़्यादा मांग वाले इलाजों में से एक बन गई हैं।

कई भारतीय दवा कंपनियाँ पहले से ही इस दिशा में कदम उठाने की तैयारी कर रही हैं। रिसर्च फर्म फार्मारेक के उपाध्यक्ष शीतल सपाले के अनुसार, सपला, सन फार्मा, डा. रेड्डी लैब, बाॅयोकान, नेटको, जाइडस और मैनकाइंड फार्मा जैसी बड़ी कंपनियाँ ब्रांडेड जेनेरिक दवाएँ तैयार कर रही हैं और उम्मीद है कि कई और कंपनियाँ भी जल्द ही इस राह पर चलेंगी, साथ ही इन दवाओं की कीमतों में भारी गिरावट आएगी।
अभी इलाज का मासिक खर्च काफी ज़्यादा है
ओजेम्पिक आमतौर पर 8,800-11,000 रुपये में बिकती है, जबकि वेगाॅय की कीमत 10 से 16 हजार रुपये तक हो सकती है। शीतल सपाले का अनुमान है कि जेनेरिक दवाओं से मिलने वाली कड़ी टक्कर के कारण ये कीमतें घटकर लगभग 3-5 हजार रुपये प्रति माह तक आ जाएँगी।

कीमतें कम होने से दवा बाज़ार में एक बड़ा बदलाव आ सकता है, फार्मारेक के अनुसार, भारत का मोटापा-रोधी दवा क्षेत्र, जिसमें इंजेक्शन और खाने वाली दवाएँ, दोनों शामिल हैं, पहले ही तेज़ी से बढ़ा है, 2021 में यह लगभग 16 मिलियन डॉलर का था, जो अब बढ़कर लगभग 100 मिलियन डॉलर तक पहुँच गया है। 2022 में राइबेल्सस के लॉन्च के बाद इसकी माँग में तेज़ी आई, यह सेमाग्लूटाइड का पहला खाने वाला वर्जन था। यह तेज़ी स्वास्थ्य के क्षेत्र में आ रहे एक बड़े बदलाव को दर्शाती है।
भारतीयों का निकला हुआ पेट : स्टेटस सिंबल से ‘साइलेंट किलर’ बनने तक का सफ़र
भारत में पहले से ही 7.7 करोड़ से ज़्यादा लोग टाइप-2 डायबिटीज़ से पीड़ित हैं, और यहाँ ज़्यादा वज़न वाले वयस्कों की आबादी दुनिया में सबसे ज़्यादा है।

शहरी जीवनशैली, कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खान-पान और कम शारीरिक मेहनत वाली आदतें – इन तीनों ही कारणों ने इन दोनों ही समस्याओं को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

डॉक्टरों के लिए, GLP-1 श्रेणी की सस्ती दवाएँ जल्द ही इन बीमारियों के इलाज के लिए एक बेहद असरदार नया हथियार साबित हो सकती हैं।
वजन घटाने की दवा का व्यापक उपयोग
वज़न घटाने वाली दवाएँ अब सिर्फ़ एंडोक्रिनोलॉजी क्लीनिक तक ही सीमित नहीं रह गई हैं।

हृदय रोग विशेषज्ञ इनका इस्तेमाल मरीज़ों को एंजियोप्लास्टी जैसी प्रक्रियाओं से पहले वज़न कम करने में मदद करने के लिए करते हैं; हड्डी रोग विशेषज्ञ घुटने की सर्जरी से पहले जोड़ों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए और छाती विशेषज्ञ ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया जैसी बीमारियों के इलाज के लिए करते हैं।

चिकित्सा विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यह बहुत अच्छी बात है कि ये दवाएँ अब सस्ती हो जाएँगी, ताकि डायबिटीज़ और मोटापे से पीड़ित भारत की ज़्यादा से ज़्यादा आबादी इनका लाभ उठा सके।”
लेकिन वह एक चेतावनी भी देते हैं: “यहाँ बनाई जा रही दवाओं की गुणवत्ता पर बहुत कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए।”
जेनेरिक दवाओं की दुनिया भर में मांग
यह सावधानी भारत के दवा उद्योग से जुड़ी एक व्यापक सच्चाई को दर्शाती है, जो कम कीमत वाली जेनेरिक दवाओं के मामले में दुनिया की एक बड़ी ताकत है।

यह देश जेनेरिक दवाओं का दुनिया का सबसे बड़ा सप्लायर है; यहाँ 60 से ज़्यादा चिकित्सीय श्रेणियों में लगभग 60,000 ब्रांडों का उत्पादन होता है, और वैश्विक जेनेरिक आपूर्ति में इसका हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है।

उदाहरण दो दशक पहले सामने आया था, जब भारतीय कंपनियों ने एच आई वी की एंटीरेट्रोवायरल दवाओं की कीमतें कम करने में मदद की थी, जिससे पूरे अफ्रीका और विकासशील देशों में इलाज का दायरा तेज़ी से बढ़ा।
190 से अधिक देशों को भारत दवा देती है
आज भारत 190 से ज़्यादा देशों को दवाएँ सप्लाई करता है, यह अफ़्रीका की जेनेरिक दवाओं की आधी से ज़्यादा ज़रूरत पूरी करता है, अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा देता है, और ब्रिटेन की दवाओं का लगभग एक-चौथाई हिस्सा सप्लाई करता है।

देश की जेनेरिक दवाओं का कुल निर्यात अभी 3046 हजार करोड़ है, अमेरिका पहले से ही इसका सबसे बड़ा बाज़ार है।


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