क्या मेडिटेशन मनुष्य के दिमाग को बदल सकता है ? : भारतीय वैज्ञानिकों की नयी रिसर्च

Spread the love

[अजय कुमार]

ध्यान (मेडिटेशन) को सदैव शांति, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन से जोड़ा जाता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि यह उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिमाग को स्वस्थ रखने में भी मदद कर सकता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के सेंटर फॉर न्यूरोसाइंस के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन से पता चलता है कि लंबे समय तक ध्यान करने से दिमाग की कुछ ऐसी गतिविधियाँ मज़बूत हो सकती हैं, जो आमतौर पर उम्र बढ़ने या न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारण कमज़ोर पड़ जाती हैं।
दिमाग की तरंगें क्या होती हैं ?


हमारा दिमाग लगातार छोटे-छोटे इलेक्ट्रिकल सिग्नल पैदा करता रहता है, जिन्हें ‘ब्रेन वेव्स’ या ‘ब्रेन ऑसिलेशन’ कहा जाता है। ये लयबद्ध सिग्नल तब दिखाई देते हैं, जब दिमाग की कोशिकाओं के समूह एक साथ सक्रिय होते हैं। सोचने, याद रखने, ध्यान देने और समझने की प्रक्रियाओं में अलग-अलग ब्रेन वेव्स अलग-अलग भूमिका निभाती हैं। जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है या उन्हें कोई न्यूरोलॉजिकल समस्या होती है, तो इनमें से कुछ ब्रेन सिग्नल कमज़ोर पड़ने लगते हैं।

नई रिसर्च से पता चलता है कि मेडिटेशन (ध्यान) इन महत्वपूर्ण सिग्नलों में से कुछ को मज़बूत बनाए रखने में मदद कर सकता है।
ध्यान और दिमाग की मज़बूत गतिविधियां
पिछले शोधों में पहले ही यह बताया जा चुका था कि मेडिटेशन से दिमाग की धीमी तरंगें, जैसे कि थीटा और अल्फा तरंगें बढ़ जाती हैं, ये तरंगें आराम और एकाग्रता से जुड़ी होती हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि अनुभवी मेडिटेटर्स में अक्सर ज़्यादा मज़बूत गामा तरंगें दिखाई देती हैं। दिमाग की ये तेज़ तरंगें ध्यान, सीखने, समझने और उच्च-स्तरीय सोच से जुड़ी होती हैं। हालाँकि, पिछली रिसर्च में ज़्यादातर गामा गतिविधि में एक सामान्य बढ़ोतरी ही देखी गई थी, जिसमें कोई खास पैटर्न नहीं पहचाना गया था।

इस नई स्टडी का मकसद यह देखना था कि क्या मेडिटेशन दिमाग के एक ज़्यादा सटीक तरह के सिग्नल पर असर डाल सकता है, जिसे ‘स्टिमुलस-इंड्यूस्ड गामा ऑसिलेशन’ कहा जाता है।
यह शोध कार्य कैसे की गयी
न्यूरोसाइंटिस्ट सुप्रतिम रे और उनकी टीम ने ब्रह्मा कुमारी राजयोग ध्यान का अभ्यास करने वालों के साथ काम किया। ध्यान की कई शैलियों के विपरीत, राजयोग का अभ्यास, खुली आँखों से किया जाता है। इससे वैज्ञानिकों को यह मापने का मौका मिला कि ध्यान के दौरान मस्तिष्क दृश्य संकेतों पर किस तरह प्रतिक्रिया करता है। शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी का इस्तेमाल किया, जो एक सुरक्षित तरीका है और मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करता है।

प्रतिभागियों को विज़ुअल पैटर्न दिखाए गए, जिनमें काले और सफ़ेद धारियों वाली तस्वीरें भी शामिल थीं, ये तस्वीरें विज़ुअल कॉर्टेक्स में गामा ब्रेन वेव्स को ट्रिगर करने के लिए जानी जाती हैं।
इस अध्ययन तुलना की गयी
30 अनुभवी ध्यान करने वाले, जिन्होंने 10,000 घंटे से ज़्यादा ध्यान का अभ्यास किया था, 30 ऐसे लोग जो कभी ध्यान नहीं करते थे और जिनकी उम्र और लिंग पहले समूह के लोगों जैसा ही था, शोधकर्ताओं को क्या मिला, यह नतीजे चौंकाने वाले थे।

ध्यान करने वालों में, ध्यान न करने वालों की तुलना में, उद्दीपन से पैदा होने वाली गामा गतिविधि कहीं ज़्यादा मज़बूत पाई गई। उन्होंने दिमाग के कई हिस्सों में भी ज़्यादा ब्रॉडबैंड गामा गतिविधि दिखाई, जिनमें फ्रंटल, टेम्पोरल और पैराइटल लोब शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों तरह के गामा सिग्नल स्वतंत्र रूप से काम कर रहे थे, जिससे पता चलता है कि ध्यान एक ही समय में दिमाग के कई तंत्रों को सक्रिय करता है।
संज्ञानात्मक गिरावट के विरुद्ध एक संभावित कवच
एक अन्य महत्वपूर्ण खोज में अनावधिक स्पेक्ट्रल ढलान (aperiodic spectral slope) नाम की एक अवधारणा शामिल थी, जो मस्तिष्क की गतिविधि का एक माप है जो आमतौर पर उम्र के साथ कम हो जाती है। ध्यान करने वालों में यह ढलान अधिक तीव्र पाई गई, जो मस्तिष्क की उन अवरोधक सर्किटों की मजबूती को दर्शाती है जो मस्तिष्क की गतिविधि को स्थिर रखने में सहायक होती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे पता चलता है कि दीर्घकालिक ध्यान मस्तिष्क के उन कार्यों को सहारा दे सकता है जो सामान्यतः समय के साथ कमजोर हो जाते हैं। भविष्य में, नियमित ध्यान संज्ञानात्मक गिरावट और अल्जाइमर जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक हो सकता है।

(द हिन्दू/दैनिक भास्कर/द ट्रिब्यून… से)


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *