[ अजय कुमार ]
नई दिल्ली :
दिल्ली में बेचैनी इस बात की है कि पाकिस्तान कैसे अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम मध्यस्थ बनकर उभर गया। हालांकि डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा सीजफायर की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही इजराइल ने लेबनान पर भारी हमला कर 254 लोगों को मार दिया, तुरंत बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग फिर से बंद कर दिया।
राजनीति विज्ञान के एक वरिष्ठ प्रोफेसर और खाड़ी देशों के जानकार, कह रहे हैं कि भारत ने अपने ही पैरों (कूटनीतिक विफलता) में कुल्हाड़ी मारकर लंगड़ा हो गया और दौड़ में जब दूसरे आगे निकल गये, तब बौखलाहट में अनाप-शनाप बयानबाजी किया जा रहा है।
क्रिप्टो डील के बाद पाक अमेरिका की नजदीकी

अप्रैल 2025 में पाक-अमेरिका के बीच हुई क्रिप्टो डील्स और मई में ऑपरेशन सिंदूर के बाद व्हाइट हाउस तक मिली अपनी नई पहुँच का इस्तेमाल करते हुए, इस्लामाबाद ने ट्रंप प्रशासन के बेहद नियंत्रित और ऊँचे तबकों में अपने लिए एक जगह बना ली।
इस्लामाबाद में समझौता मंच तैयार
पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम मध्यस्थ के तौर पर उभरा है। सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दो हफ़्ते के युद्धविराम करवाने और 10 अप्रैल को पाकिस्तान में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल-स्तर की बातचीत के लिए मंच तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है।
ट्रम्प को चाहिए रास्ता : पाकिस्तान ने ऊंगली पकड़ी
इस बात को लेकर नई दिल्ली में साफ़ तौर पर बेचैनी है। सरकारी हलकों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस मामले से निकलने का कोई रास्ता ढूंढ रहे थे और पाकिस्तान ने तुरंत उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ा दिया।
हालांकि, घटनाओं के क्रम से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान ने बहुत ही सोची-समझी और नपी-तुली रणनीति के तहत अपनी चालें चलीं, जिसके बदौलत वह अपनी हैसियत से कहीं ज़्यादा बड़ा और असरदार काम करने में कामयाब रहा।
शहबाज को धन्यवाद : ईरान
ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री अराघची, दोनों ने ही पाकिस्तान की तारीफ़ की। जहाँ ट्रंप ने इस विराम का श्रेय प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ हुई बातचीत को दिया, वहीं अराघची ने कहा “मेरे प्यारे भाइयों (मुनीर और शरीफ़) को युद्ध खत्म करने के लिए उनके अथक प्रयासों के लिए आभार” और तारीफ़ ज़ाहिर की।
सबका आभार : शहबाज शरीफ
अपनी ओर से, शरीफ़ ने चीन, सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और क़तर को युद्धविराम तक पहुँचने में ‘अमूल्य और पूर्ण समर्थन देने’ के लिए धन्यवाद दिया, जो समर्थन के एक व्यापक गठबंधन का संकेत है। उन्होंने ‘गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के भाईचारे वाले देशों’ और अमेरिकी नेतृत्व को भी ‘शांति को एक मौका देने में उनके असाधारण रणनीतिक दूरदर्शिता, समझदारी और धैर्य’ के लिए धन्यवाद दिया।
महीनों की कूटनीति
पाकिस्तान के दैनिक अखबार डॉन के अनुसार, इस घोषणा से पहले दो सप्ताह से अधिक समय तक गहन, काफी हद तक गुप्त कूटनीति चली। रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद इस्लामाबाद ने तुरंत कार्रवाई की। पहले हमले के कुछ ही दिनों के भीतर, पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई राजधानियों में राजनयिक संपर्क स्थापित करना शुरू कर दिया। अखबार ने लिखा कि सार्वजनिक रूप से तटस्थता बनाए रखते हुए, पाकिस्तान ने चुपचाप खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित किया, ये दोनों ऐसे विरोधी हैं जिनके बीच सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं। पाकिस्तान वाशिंगटन में ईरान के हितों का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे उसे दोनों राजधानियों में एक दुर्लभ संस्थागत पकड़ मिल जाती है।
पाकिस्तान की कोशिशें मार्च से शुरू
एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की कोशिश का सबसे साफ़ चरण 29-30 मार्च को सामने आया, जब पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की के विदेश मंत्री इस्लामाबाद में मिले।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की अगुवाई में हुई इन बातचीत का मुख्य उद्देश्य, आगे किसी भी तरह के सैन्य टकराव को रोकना और अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत शुरू करने के लिए एक ढांचा तैयार करना था।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इसमें इस्लामाबाद में व्यवस्थित बातचीत की योजना थी और हालांकि तुरंत बातचीत शुरू नहीं हो पाई, लेकिन इस्लामाबाद ने अपनी कोशिशों को कम करने के बजाय और तेज़ कर दिया।
मुनीर अमेरिका के संपर्क में
मुनीर ने अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की, जिनमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल थे, वहीं शरीफ़ और डार ने वॉशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग, यूरोप के प्रमुख शहरों, गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों, तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के एक दर्जन से ज़्यादा विश्व नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों से बात की। रिपोर्ट के अनुसार, इसका मकसद औपचारिक बातचीत की दिशा में पहले कदम के तौर पर, एक सीमित संघर्ष-विराम पर आम सहमति बनाना था।
पाकिस्तानी अधिकारी अपने ईरानी समकक्षों के संपर्क में बने रहे, जिनमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़े लोग भी शामिल थे और उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ऐसे समय में भी बातचीत के रास्ते खुले रहें, जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सीधी बातचीत बहुत सीमित हो गई थी।
संघर्ष-विराम का ढाँचा
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल की शुरुआत तक इस्लामाबाद ने एक “संघर्ष-विराम का ढाँचा” जारी किया, जिसमें शत्रुता को तत्काल रोकने का प्रस्ताव था। इसमें प्रमुख समुद्री मार्गों के आस-पास तनाव कम करना भी शामिल था।
हालाँकि इसमें देरी होती रही और मतभेद भी गहरे बने रहे, विशेष रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और समुद्री पहुँच के मामलों पर। लेकिन बढ़ते सैन्य और राजनीतिक दबाव ने समझौते के लिए गुंजाइश बना दी। जैसे-जैसे समय-सीमा नज़दीक आती गई और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का डर बढ़ता गया, पाकिस्तान के प्रस्ताव को समर्थन मिलने लगा और इसके परिणामस्वरूप 7 अप्रैल को संघर्ष-विराम हो गया।
10 अप्रैल युद्धग्रस्त देशों के प्रतिनिधिमंडल मिलेंगे
अगला चरण 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में शुरू होने की उम्मीद है, जहाँ प्रतिनिधिमंडल एक अधिक स्थायी व्यवस्था की रूपरेखा पर विचार-विमर्श करेंगे।
पिछले साल मई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में सीज़फ़ायर का ऐलान करने वाले ट्रंप के ट्वीट और मध्यस्थता के उनके बार-बार किए गए दावों, जिनका पाकिस्तान ने भी समर्थन किया था, के बाद से ही नई दिल्ली सतर्क रही है।
राजनीतिक गलियारों में पाकिस्तान मजबूत हुआ
दिल्ली में इस बात को लेकर चिंता है कि पाकिस्तान, जिसे उसने कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग करने की कोशिश की थी, ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में अपनी एक मज़बूत जगह बना ली है।
कई हलकों में यह पक्का आंकलन है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर की असामान्य टिप्पणियाँ और उनके द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा, जिसमें उन्होंने युद्ध के संदर्भ में पाकिस्तान को ‘दलाल’ कहा था, उचित नहीं थी।
भारतीय रणनीति/कूटनीति काम ना आयी
खाड़ी क्षेत्र में काम कर चुके एक पूर्व राजनयिक ने कहा, कि अगर अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ती है और हमारे सहयोगियों को शामिल करते हुए इस बेहद मुश्किल रास्ते पर कुछ प्रगति होती है, तो भारत के लिए पाकिस्तान को अलग-थलग करना और उसे विलेन के तौर पर पेश करना मुश्किल होगा, खासकर हमारी ऊर्जा ज़रूरतों और इस क्षेत्र पर हमारी निर्भरता को देखते हुए।
आने वाले हफ़्तों और महीनों में, भारतीय तंत्र वॉशिंगटन के साथ बातचीत करके कुछ बढ़त बनाने के तरीके तलाशेगा, क्योंकि विदेश सचिव विक्रम मिसरी अमेरिका जा चुके हैं और जयशंकर 11-12 अप्रैल को यूएई की यात्रा पर जाएंगे।