
[ अजय कुमार ]
नई दिल्ली/मुंबई :
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायधीश सूर्यकांत अपने कॉकरोच वाले बयान को लेकर काफी चर्चा में रहे। अब एक नए मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ भी हाल में एक दिए गए बयान को लेकर फंस गए हैं।
चंद्रचूढ़ का मासिक धर्म पर बयान
इस विवाद की जड़ में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ को मासिक धर्म और पूजा संबंधी एक सार्वजनिक टिप्पणी के कारण भेजा गया कानूनी नोटिस है। जिसमें कहा गया है कि पूर्व सीजेआई की विशेष टिप्पणी से सनातन और धर्म से जुड़ी भावनाएं आहत हुईं हैं।
अशुद्ध नहीं मासिक धर्म वाली महिलाएं
पूर्व न्यायधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ से जुड़ा मामला क्याh है? मामला तब का है जब उन्होंने 28 मई 2026 को आयोजित एक कार्यक्रम में अपने परिवार में अपनी ही पुत्रवधू के साथ हुए एक प्रसंग को बताया। जिसमें उन्होंने कहा था कि मासिक धर्म किसी व्यक्ति को अशुद्ध नहीं बनाता और महिलाएं इस दौरान भी पूजा-अर्चना में भाग ले सकती हैं।
अधिवक्ता को बुरा लगा
उनके इस बयान पर मुंबई के अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने उन्हें कानूनी नोटिस भेजा है। घनश्याम उपाध्याय का कहना है कि उनके बयान से उनकी सनातन धर्म संबंधी भावनाओं का अपमान हुआ है और उपाध्याय ने पूर्व न्यायधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ को नोटिस भेज कर बिना शर्त माफी और सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग की है।
पूर्व सीजेआई बताएं कि क्या वह ऐसा बोल कर, किसी लंबित धार्मिक विवाद या न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना चाहते थे।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता की बहस
अपने अदालती फैसलों में भी पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ मासिक धर्म के मसले पर अधिकारों का समर्थन कर चुके हैं। उनकी अध्यक्षता वाली पीठ के तहत मासिक धर्म के स्वास्थ्य और स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार माना है। ऐसे में बात महज पूर्व सीजेआई के बयान भर की नहीं है। इससे भारतीय संविधान के दो महत्वपूर्ण अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न भी खड़ा करता है।
चंद्रचूढ़ का बयान धार्मिक रिवाजों के विरुद्ध : अधिवक्ता
कानूनी नोटिस में आरोप लगाया गया है कि पूर्व सीजेआई ने अपने निजी अनुभव को सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार प्रस्तुत किया जिससे सनातन धर्म की पारंपरिक मान्यताओं और धार्मिक प्रथाओं को चुनौती मिली।
नोटिस के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान कुछ धार्मिक प्रतिबंधों का पालन कई हिंदू परंपराओं में स्थापित धार्मिक अभ्यास का हिस्सा है और इसे सामाजिक भेदभाव या अपमान के रूप में नहीं देखा जाता।
नोटिस भेजने वाले वकील का तर्क है कि चंद्रचूड़ की टिप्पणी ने इन मान्यताओं को गलत तरीके से प्रस्तुत किया और करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को प्रभावित किया।
सबरीमाला मंदिर विवाद लंबित
इस नोटिस की सबसे बड़ी बात है कि इसमें अदालत में चल रहे विशेष रूप से सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद का उल्लेख किया गया है, जहां इसी तरह के मसले से जुड़े महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक परंपराओं को लेकर संवैधानिक बहस पहले से हो रही है। उनसे यह जवाब मांगा गया है कि वह बताएं कि क्या वह ऐसा बोल कर, किसी लंबित धार्मिक विवाद या न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना चाहते थे।
क्या हो सकती है पूर्व सीजेआई की प्रतिक्रिया
हालांकि मामले से जुड़े दोनों लोग न्याय क्षेत्र से ही जुड़े हैं। कानूनी नोटिस का जवाब तय सीमा के अंदर देना होता है। यदि नोटिस भेजने वाले को एक तय सीमा के अंदर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता तो यह उसके उपर है कि वह अगला कदम क्या लेता है। यह उसके विवेक पर निर्भर करेगा कि वह इस मसले को अदालत में ले जाना चाहता है या नहीं।
बहरहाल, यदि पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की ओर से कुछ ठोस जवाब आता है तो यह मसला महज, कानूनी बहस का ही नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक सुधार की अवधारणाओं पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा का आधार भी बन सकता है।
चंद्रचूढ़ के जवाब का इंतजार
फिलहाल, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की ओर से कानूनी नोटिस पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस घटनाक्रम ने समकालीन भारतीय समाज में संवैधानिक मूल्यों, लैंगिक समानता, धार्मिक प्रथाओं और व्यक्तिगत आस्था के अंतर्संबंधों पर बहस को फिर से हवा दे दी है।