
[ अजय कुमार ]
- चुनाव आयुक्त की नजर में संसद की हैसियत कुछ नहीं…
- असली तानाशाह ज्ञानेश कुमार हैं…
- कानून मंत्रालय ने अबतक संज्ञान में क्यों नहीं लिया…
- सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है किन्तु यहां तो सही समय में न्याय मिलता ही नहीं…
- चुनाव आयोग के नये फॉर्म 6 में अब माता-पिता की एसआईआर में जानकारी देनी होगी…
- यह संसद में कानूनी संशोधन के बदलाव के बिना कैसे हो सकता है…
- आनलाइन फार्म 6 मे काॅलम है, आफलाइन में नहीं…
नई दिल्ली :
चुनाव आयोग की मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए भरे जाने वाले नये फॉर्म में अब माता-पिता की एसआईआर की जानकारी देनी होगी। चुनाव आयोग जो नये फॉर्म 6 ऑनलाइन भरवा रहा है उसमें यह जानकारी मांगी गई है। पहले यह जानकारी नहीं देनी होती थी। यानी नये फॉर्म में बदलाव किया गया है।
द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक यह बदलाव बिना नियमों में संशोधन किए ही किया गया है, इस वजह से चुनाव आयोग एक बार फिर मतदाता सूची से जुड़े नियमों को लेकर विवादों में घिर गया है। आरोप है कि चुनाव आयोग ने बिना किसी कानूनी संशोधन या सरकारी अधिसूचना के फॉर्म में नया कॉलम जोड़ दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक़, यह बदलाव केवल ऑनलाइन फॉर्म में दिखाई दे रहा है, जबकि इसी फॉर्म का ऑफलाइन संस्करण अब भी पुराने रूप में उपलब्ध है। इससे चुनाव आयोग की प्रक्रिया और क़ानूनी वैधता पर सवाल उठने लगे हैं।
परिवार की पूरी जानकारी मांगी जा रही है
यदि कोई व्यक्ति पहले या दूसरे विकल्प का चयन करता है तो उसे अतिरिक्त जानकारी भी भरनी पड़ती है। फिर उससे पूछा जाता है कि विधानसभा क्षेत्र, बूथ नंबर, मतदाता सूची में क्रमांक क्या है। यदि आवेदक यह जानकारी नहीं दे पाता तो उसके पास केवल तीसरा विकल्प बचता है कि न उसका और न ही उसके परिवार का नाम एसआईआर सूची में था। हालाँकि पोर्टल पर यह नहीं बताया गया है कि तीसरा विकल्प चुनने पर आवेदन पर क्या असर पड़ेगा।
ऑनलाइन में अनिवार्य है, ऑफलाइन में नहीं
दिलचस्प बात यह है कि यह नया कॉलम आधिकारिक तौर पर अनिवार्य नहीं बताया गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यदि आवेदक यह हिस्सा नहीं भरता है तो ऑनलाइन आवेदन आगे बढ़ ही नहीं पाता, मतलब बिना यह जानकारी भरे, फॉर्म-6 सबमिट करना संभव नहीं है।
बिना नियम संशोधन बदलाव करने का आरोप
कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग अपने स्तर पर फॉर्म -6 में बदलाव नहीं कर सकता है, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म-6 एक वैधानिक फॉर्म है। इसमें किसी भी प्रकार का संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार को है, जो कानून मंत्रालय की अधिसूचना के ज़रिए नियम बदलती है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दो पूर्व वरिष्ठ चुनाव अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ‘चुनाव आयोग अपने स्तर पर फॉर्म-6 में एक कॉमा तक नहीं जोड़ सकता।’ उनका कहना है कि फॉर्म में किसी भी बदलाव के लिए कम से कम कानून मंत्रालय की अधिसूचना जरूरी होती है।
पहले भी ऐसे हुआ था संशोधन
इससे पहले जब संसद ने वर्ष 2021 में मतदाता सूची को आधार से जोड़ने का कानून बनाया था, तब 17 जून 2022 को कानून मंत्रालय ने आधिकारिक अधिसूचना जारी कर फॉर्म-6 में बदलाव किए थे। यानी पहले नियम बदले गए, फिर फॉर्म में संशोधन किया गया। लेकिन इस बार ऐसी कोई अधिसूचना अब तक सामने नहीं आई है।
एसआईआर का है मामला
यह विवाद तब सामने आया है जब देश के कई राज्यों में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर पहले से विवाद चल रहा है। पिछले एक साल में 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 5.58 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इसी दौरान पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए थे, जिनमें से कई लोग विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर सके क्योंकि उनकी अपीलें अभी भी लंबित हैं।
अब आशंका जताई जा रही है कि जिन परिवारों के नाम एसआईआर के दौरान हटाए गए हैं, उनके बच्चों या नए मतदाताओं के आवेदन भी प्रभावित हो सकते हैं।
एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग पर लगे कई आरोप
जब से चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का एसआईआर विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू किया है, तब से इस पर विपक्षी पार्टियाँ नियमों को तोड़-मरोड़कर ऐसे बदलाव किए जाने के आरोप लगाते रहे हैं, दरअसल, विपक्षी दल पूरी एसआईआर प्रक्रिया को ही ग़लत और अवैध होने का दावा करते रहे हैं और यही वजह है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।
सुनवाई के दौरान कई बार अदालत ने चुनाव आयोग को फटकार लगाई और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान लगातार नियमों में बदलाव करने पड़े। चुनाव आयोग पर एसआईआर के दौरान निर्वाचन नियमावली 1960 के प्रावधानों का उल्लंघन करने का आरोप लगा और दावा किया गया कि फॉर्म 6, 7, 8 के माध्यम से दावे-आपत्तियों के समाधान के लिए सही समय नहीं दिया गया। यह भी आरोप लगाए गए कि मतदाता सूची नियमावली के तहत नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई।