भारतीय महिलाओं के साथ राजनीतिक षड्यंत्र

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[ अजय कुमार ]

  • मोदी-ट्रम्प में झूठ की प्रतियोगिता…
  • भारतीय-अमेरिकी जनता झूठ से त्रस्त…
  • महिलाओं के साथ केन्द्र सरकार का षडयंत्र…
  • पुरुष-प्रधान-वादी विचारधारा…
  • पं. डीडी उपाध्याय के एकात्मवाद की जगह, स्व-आत्मवाद की ओर अग्रसर सरकार…
  • गलतियों को झूठ बोलकर सच साबित करने जैसा लोकतांत्रिक गुनाह…

33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल का सच
इस बिल को आधिकारिक तौर पर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (2023) कहा जाता है, संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 में बने अधिनियमों के तहत, आरक्षण की संख्या लोकसभा और विधानसभाओं में कुल सीटों का 33 प्रतिशत (1/3) महिलाओं के लिए आरक्षण के बिंदुओं के साथ दोनों सदन में सर्वसम्मति से बिल पास हुआ।

महिला आरक्षण विधेयक (2023) के एक अन्य बिंदु के अनुसार, यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा। इसे लागू करने की प्रक्रिया में संदर्भित कानून को जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद लागू होगा, जो 2029 या उसके बाद की संभावना दर्शाता है, इसमें कोटे के भीतर कोटा अर्थात अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए होगा।
आरक्षण का गणित
अर्थात् अगर 543 लोकसभा सीटें हैं, तो 181-182 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
इसी तरह हर राज्य की विधानसभा में 33 प्रतिशत महिला प्रतिनिधि अनिवार्य होंगी, केंद्र शासित प्रदेश विधानसभाओं में भी सीटें आरक्षित होंगी, महामहिम राष्ट्रपति ने बिल पर हस्ताक्षर भी कर दिया और यह कानून का रूप ले चुका है।
गजट मे प्रकाशित करना भूल गयी थी सरकार
लेकिन एनडीए सरकार ने गजट में प्रकाशित कर, इसकी अधिसूचना जारी नहीं की और इस बिल में विशेष सत्र आमंत्रित कर, संसोधन प्रस्ताव ले आयी। चूंकि 2023 में पास विधेयक को गजट में प्रकाशन के बाद ही संसोधन प्रस्ताव लायी जा सकती है अत: आनन फानन में 16 अप्रैल 2026 की मध्य रात्रि को उपरोक्त महिला आरक्षण बिल विधेयक को भारत सरकार के गजट में प्रकाशित किया गया।

सारा कूटनीतिक खेल महिलाओं और पुरुषों के बीच आंकड़े बाजी का है कि सदन में संख्या, महिलाओं की बढ़ेंगी और पुरुषों की घटेगी, लोकसभा के 543 सीट में 33 प्रतिशत के आधार पर महिलाओं की संख्या 181 हो जाती और पुरुष की संख्या घटकर 362। बस खेल यहीं से प्रारंभ हुआ क्योंकि मामला पुरुष प्रधान सोच का है।
विशेष सत्र में विशेष झूठ
16 से 18 अप्रैल को विशेष लोकसभा का सत्र बुलाकर, जिसे महिला आरक्षण बिल में संसोधन प्रस्ताव बताया गया, यह महिला आरक्षण बिल था ही नहीं, इस बिल की आड़ में डीलिमिटेशन बिल था, जिसका यूपीए के सांसदों ने विरोध किया और जब सदन में मतदान विभाजन हुआ, तो एनडीए सरकार को हार का सामना करना पड़ा, क्योंकि एनडीए चाहती थी कि डीलिमिटेशन कमेटी का गठन किया जाए, चूंकि जनगणना चल ही रही है और इसे इस बिल के माध्यम से 2029 के लोकसभा चुनाव में लागू किया जा सके, लेकिन यह चाल फेल हो गयी।
महिला आरक्षण बिल में परिसीमन शामिल…
अब आंकड़ों के खेल में बात अगर डीलिमिटेशन होता, तो 850 लोकसभा सीट बढ़ाने की योजना थी, इसमें 33 प्रतिशत महिला आरक्षण अधिनियम के तहत महिलाओं के लिए 283 सीट होती और लगभग 567 सीट पुरुष वर्ग के लिए सुरक्षित होती।

बस टांका यही फंसा था, वर्तमान में लोकसभा में 543 लोकसभा सदस्यों में 74 महिला सांसद है। 2019 के लोकसभा चुनाव पश्चात महिलाओं की संख्या 78 थी। बस राजनीति यहीं से शुरू हुई चूंकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं और प्रधानमंत्री 18 अप्रैल को देश के नाम संबोधन में महिला आरक्षण बिल संसोधन को पास नहीं होने का लगाते हुए विपक्ष पर ठीकरा फोड़ दिया, विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए महिला विरोधी बताये।
धोखा का मामला… यहीं तक नहीं रुका
भाजपा के केंद्रीय संगठन ने सभी राज्यों के प्रदेश संगठन को निर्देश दिया कि विपक्ष के विरोध में महिलाओं का जबरदस्त प्रदर्शन करें और कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगे कि उन्होंने महिलाओं को आरक्षण से वंचित कर दिया।

केंद्रीय भाजपा संगठन ने देश के 21 राज्यों में भाजपा/एनडीए शासित सरकारों को निर्देश दिया कि वह अपने-अपने प्रदेश में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर, विपक्ष के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पास करें।
छत्तीसगढ़ में प्रदर्शन
20 अप्रैल को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदर्शन हुआ, प्रदर्शन में आने वाली महिलाओं से जब पूछा गया कि आप लोगों को तो 2023 में ही 33 प्रतिशत आरक्षण मिल चुका है और इसे एनडीए सरकार ने रोक कर रखी है तो उन्होंने कहा कि हमें नहीं मालूम हमें तो यह बताया गया कि विपक्ष ने महिला आरक्षण बिल को पास होने नहीं दिया और हम प्रदर्शन करने आए हैं।
छत्तीसगढ़ में निंदा प्रस्ताव का ढकोसला
सूत्रों के मुताबिक छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार 30 अप्रैल 2026 को छत्तीसगढ़ विधानसभा का विशेष सत्र आमंत्रित कर विपक्ष के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पास करेंगे, जैसा कि मुख्यमंत्री ने मीडिया में बयान दिया है।

लेकिन क्या देश बुद्धिजीवियों और संवैधानिक जानकारों के बीच चर्चा है कि देश की सर्वोच्च पंचायत लोकसभा में जो कार्रवाई हुई है, उसके विरुद्ध क्या राज्यों की विधानसभाओं निंदा प्रस्ताव पास कर सकती है, यह देश के इतिहास में पहली बार होगा।
निंदा प्रस्ताव में संवैधानिक अड़चन नहीं : सुप्रीम कोर्ट
हाँ, लोकसभा में किसी विधेयक के पास या फेल होने पर राज्य सरकारें अपनी विधानसभा में निंदा प्रस्ताव ला सकती हैं।
हालाँकि, यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक विरोध दर्ज कराने का एक माध्यम है, इसके पास होने से संसद द्वारा पारित कानून पर कोई कानूनी रोक नहीं लगती।

2021 सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य विधानसभाओं द्वारा केंद्र सरकार के कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने में कोई बुराई नहीं है। ये प्रस्ताव राज्य सरकार का “विचार” हैं, न कि कानून का हिस्सा।
विधेयक लागू है… फिर भी नौटंकी
भाजपा और एनडीए पूरे देश भर में अपने संगठन के माध्यम से महिलाओं को लेकर प्रदर्शन का कार्यक्रम कर रही है और अब कांग्रेस भी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, कांग्रेस का कहना है कि जब 2023 में महिला आरक्षण बिल 33 प्रतिशत सर्वसम्मति से लोकसभा और राज्यसभा में पास हो चुका है राष्ट्रपति की हस्ताक्षर हो चुके हैं और 16 अप्रैल 2026 को एनडीए की सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी है तो फिर इसे तत्काल लागू किया जावे।
झूठ का प्रदर्शन : महिलाओं और जनता को मूर्ख समझने की गलती
किन्तु एनडीए सरकार किसी तरीके से जनगणना और डीलिमिटेशन के मामले को लेकर यह बिल में पेंच फसाने में लगी हुई है, छत्तीसगढ़ और देश की महिलाएं भ्रमित है कि आखिर सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन बोल रहा है हमारे 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर हमारे साथ खिलवाड़ कौन कर रहा है लेकिन जिस दिन महिलाओं को सच्चाई पता चलेगी, उस दिन भाजपा और एनडीए को राजनीतिक स्तर पर नुकसान तो उठाना पड़ेगा।


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