[ अजय कुमार ]
- कल 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संसाधन का प्रस्ताव
- विधायी निकायों में महिला आरक्षण बिल प्रस्तुत किया जायेगा
- परिसीमन आयोग की गठन के लिए प्रस्ताव व अधिसूचना का विषय
भारत के इतिहास में समय-समय पर ऐसे मोड़ आते हैं जो देश की दिशा तय करते हैं, परिसीमन विवाद दक्षिण भारत के लिए यही वो ऐतिहासिक क्षण प्रतीत हो रहा है।
यह चर्चा के केंद्र में है ”विधेयक संख्या 107, वर्ष 2026” (131वां संशोधन विधेयक), यह महज 5 पृष्ठों का दस्तावेज़ नहीं है। इसमें अंकित प्रावधान आने वाले 50 साल तक दक्षिण भारत की राजनीति को बदलने की ताकत रखते हैं, दक्षिण भारत के नेता अगर इसे राजनीतिक अन्याय करार दे रहे हैं तो वे गलत तो नहीं ही हैं।
सीटों में बढ़ोतरी : न्याय या नया संकट…
सरकार ने लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि इसमें एक बड़ा पेंच है, विधेयक में कहीं भी यह जिक्र नहीं है कि क्या किसी राज्य के लिए कम से कम सीटों की कोई गारंटी होगी।
- क्या जनसंख्या नियंत्रित रखने वाले राज्यों को कोई इनाम या सुरक्षा मिलेगी ?
- क्या टैक्स देने में आगे रहने वाले राज्यों को कोई प्राथमिकता दी जाएगी ?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2001 में जो ‘सीट फ्रीज’ (सीटों को न बढ़ाने की सुरक्षा) दी गई थी, यह विधेयक उसे खत्म कर रहा है, लेकिन उसके बदले राज्यों को कोई संवैधानिक गारंटी नहीं दे रहा।
जनगणना और संसद का नियंत्रण
अब तक का नियम था कि जनगणना के आंकड़े आते ही सीटों का निर्धारण (परिसीमन) अपने आप हो जाता था। लेकिन नए विधेयक की धारा 2 के अनुसार, अब संसद तय करेगी कि किस जनगणना के आधार पर सीटें बांटी जाएंगी। इसका सीधा मतलब है कि जिस दल की सरकार होगी, उसी का नियंत्रण इस बात पर होगा कि किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी, जैसे अभी जो परिसीमन विधेयक है, उसमें 2011 की जनगणना के हिसाब से सीटें बांटी जाएंगी।
किसी राज्य को सुरक्षा और किसी को नहीं…
कुछ चयनित सुरक्षात्मक दृष्टिकोण, जिसमें उत्तर-पूर्व को संरक्षण मिला है किन्तु दक्षिणी राज्यों को क्यों नहीं मिला।
विधेयक की धारा 7 में अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड जैसे राज्यों के लिए सीटों की सुरक्षा का स्पष्ट फॉर्मूला दिया गया है, बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार इन राज्यों के लिए सुरक्षा की कानूनी भाषा लिख सकती है, तो तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का नाम इसमें क्यों नहीं है ? दक्षिण के राज्यों के लिए कोई लिखित आश्वासन क्यों नहीं दिया गया ?
परिसीमन आयोग : असीमित शक्तियां

विधेयक के पास होने के बाद एक ‘परिसीमन आयोग’ बनेगा जो चुनाव क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करेगा, इस आयोग के सदस्यों को केंद्र सरकार चुनेगी, मोदी सरकार ने जो तरीका सीबीआई और चुनाव आयोग के प्रमुखों के चयन में अपनाया, उसकी व्यवस्था प्रस्तावित परिसीमन आयोग में भी होगी। इस चयन प्रक्रिया में दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
अच्छे काम की सजा दक्षिण भारत को क्यों ?
दक्षिण भारत ने बीते दशकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में शानदार काम किया है, साथ ही, ये राज्य देश के खजाने में सबसे ज्यादा टैक्स देते हैं, लेकिन इस नए गणित से डर यह है कि बेहतर काम करने के बावजूद संसद में दक्षिण की आवाज कमजोर हो जाएगी और जनसंख्या बढ़ाने वाले राज्यों का दबदबा बढ़ जाएगा।
- तमिलनाडु प्रत्येक रुपये के बदले, केंद्र सरकार से लगभग 27 से 30 पैसे प्राप्त करता है।
- कर्नाटक प्रत्येक ₹1 के बदले केंद्र सरकार से लगभग 12 से 15 पैसे प्राप्त करता हैं।
- केरल हर रुपये के बदले केंद्र सरकार से लगभग 21-25 पैसे प्राप्त करता है।
आपत्तिजनक क्या है…
सिद्धारमैया, एमके स्टालिन, रेवंत रेड्डी अगर दक्षिण के अन्याय की बात उठा रहे हैं तो इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है, अगर वो दक्षिण भारत के सभी सांसदों को एकजुट कर रहे हैं तो यह देश विरोधी स्टैंड कैसे है ? दक्षिण भारत अगर ‘संवैधानिक सुरक्षा’ का मुद्दा उठा रहा है तो अनुचित कैसे है, अगर सरकार दूसरे राज्यों को सुरक्षा दे सकती है, तो दक्षिण को क्यों नहीं?
आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि क्या भारत के कुछ चालाक नेता वाकई उत्तर-दक्षिण का ऐसा विभाजन करने में सफल रहेंगे।
परिसीमन पर तमिलनाडु के सीएम
एमके स्टालिन ने 1950-60 के दशक जैसे विरोध-प्रदर्शन की चेतावनी के बाद अब गुरुवार को बड़े प्रदर्शन की घोषणा कर दी है। डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने बुधवार को केंद्र सरकार की प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के ख़िलाफ़ पूरे राज्य में काला झंडा दिखाते हुए विरोध प्रदर्शन का ऐलान कर दिया है, यह विरोध कल गुरुवार यानी 16 अप्रैल को होगा। स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर केंद्र तमिलनाडु और दक्षिण भारतीय राज्यों की बात नहीं मानता तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।