[ अजय कुमार ]
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम के चमचमाते लिफाफे में स्वार्थ के टेबलेट्स
- वैसे तो भारतीय राजनीति में देश के राष्ट्रीय और प्रादेशिक दलों में महिला भक्षकों का एक दूषित इतिहास है, इस मलिन खेल के आंकड़ों में भाजपा की प्रतिशतता बहुत अधिक है।
महिला आरक्षण पर संविधान संशोधन विधेयक गिर गया खुद को महिला हितैषी प्रचारित करने वाली भाजपा का महिला उत्पीड़न को लेकर कैसा रवैया रहा है? आख़िर उसका ट्रैक रिकॉर्ड क्या कहता है?
नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाने, सरकार का अभिनंदन
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ लाने के लिए मोदी सरकार का अभिनंदन किया जाना चाहिए, देश के नर-नारी इसके पक्ष में हैं, किंतु वे झूठ और ढकोसले के पक्ष में कदापि नहीं हैं। जब देश के 21 राज्यों की पंचायतों में महिलाओं को पहले ही 50 प्रतिशत आरक्षण मिल चुका है, तो मात्र 33 प्रतिशत आरक्षण वाले इस अधिनियम का ढिंढोरा पीटने वालों की नीयत को समझना अनिवार्य है।
‘एप्सटीन फाइल्स से लेकर मणिपुर तक की घटनाओं में महिला सम्मान…?
नारी शोषण की वैश्विक प्रतीक बनीं ‘एप्सटीन फाइलों’ से लेकर मणिपुर की हृदयविदारक घटनाओं और मधु किश्वर तक देश भर में नारियों के क्रंदन के बीच, जब सरकार ‘नारी शक्ति वंदन’ की बात करती है, तो उसकी नीति और नीयत का अंतर स्पष्ट हो जाता है। क्या यह वास्तव में महिला वंदन है या मात्र मीडिया प्रबंधन ? मणिपुर में आज भी महिलाएं सड़कों पर मशालें लेकर न्याय की गुहार लगा रही हैं! उनके आंसुओं के बीच, चुनिंदा आमंत्रित महिलाओं से घिरे प्रधानमंत्री की मुस्कुराहट, आंकड़ों के आईने में महिला सम्मान के उस मुखौटे को तार-तार कर देती है, जो कांच के बारीक टुकड़ों की तरह बिखरा नजर आता है।
प्रधानमंत्री मोदी के इस यस सर वाले आंकड़ों की तुलना यदि डॉ. मनमोहन सिंह के महिला-केंद्रित दशक से करें, तो एक भयावह सत्य उभरता है। क्या यह वास्तव में नारी का वंदन था या 2029 और 2034 के चुनावों के लिए किया गया एक चतुर ‘चुनाव प्रबंधन’?
मुखर मोदी और मौन मनमोहन
अति-मुखर मोदी सरकार के विज्ञापनों में 5 लाख करोड़ रुपये के “जेंडर बजट” का डंका पीटा जाता है। किंतु जब वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए लिखित उत्तरों और बजट डिमांड नंबर 101 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का विश्लेषण किया जाता है, तो यह वास्तविकता की कसौटी पर विफल सिद्ध होता है।
यूपीए सरकार की मौन क्रांति (2004-2014)
डॉ. मनमोहन सिंह ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट ₹3,026 करोड़ (2004-05) से बढ़ाकर ₹18,584 करोड़ (2013-14) पहुँचाया। यह 16.4 प्रतिशत की सीधी वृद्धि थी। बिना किसी मेगा-इवेंट के, पैसा सीधा जमीन पर काम करने वाले तंत्र (एकीकृत बाल विकास सेवाएं और आंगनवाड़ी) को दिया गया।
एनडीए का शोरगुल फीका (2014-2024)
यूपीए के बाद अगले 10 वर्षों में मोदी सरकार ने इस बजट को ₹18,584 करोड़ से बढ़ाकर मात्र ₹26,092 करोड़ (2024-25) तक पहुँचाया। वृद्धि दर? केवल 40 प्रतिशत…
अब कड़वे सच में मुद्रास्फीति को जोड़ें तो आज की नारी को उसके हक का आधा भी नहीं मिल रहा। यदि मनमोहन सिंह वाली रफ़्तार जारी रहती, तो आज इस मंत्रालय का बजट ₹50,000 करोड़ से ₹60,000 करोड़ के बीच होना चाहिए था। यह कमी सीधे तौर पर कुपोषण और महिला सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को कमजोर कर रही है।
जेंडर बजट की गणितीय बाजीगरी
सरकार ने जेंडर बजट का आंकड़ा ₹5.41 लाख करोड़ (2025-26) दिखाकर एक भ्रम पैदा किया है, यह समझना जरूरी है कि यह सारा पैसा नया निवेश नहीं है।
सरकार के इस टैगिंग के खेल ने पीएम आवास और पीएम किसान जैसी बड़ी योजनाओं के खर्च को जेंडर बजट में ही टैग कर दिया है। यदि एक घर महिला के नाम पर बना, तो घर की पूरी निर्माण लागत को महिला कल्याण में जोड़ दिया गया। यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि पुरानी योजनाओं को नया चश्मा पहनाना है।
बजट में कटौती का सच
2025-26 के संशोधित अनुमान बताते हैं कि घोषणा ₹4.49 लाख करोड़ की थी, लेकिन वास्तव में खर्च में ₹51,000 करोड़ की कटौती की गई।
विज्ञापनों में ‘बेटी बचाओ’, हकीकत में ‘चेहरा चमकाओ’
‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना, इस सरकार के प्रचार तंत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है। संसदीय स्थायी समिति के अनुसार “2014 से 2019 के बीच बीबीबीपी के कुल फंड का 56 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल विज्ञापनों और प्रचार पर खर्च कर दिया गया। स्वयं स्मृति ईरानी ने संसद में स्वीकार किया था कि विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये उड़ाए गये, जब बेटियों की शिक्षा के बजाय पैसा होर्डिंग्स पर खर्च होता है, तो यह ‘वंदन’ नहीं, बल्कि ‘विपणन’ बन जाता है।
सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर महिलाओं का ‘अदृश्य’ होना
नारी वंदन के नारों के बीच यह तथ्य चौंकाने वाला है कि सत्ता के सबसे ताकतवर केंद्रों में महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है, नियुक्ति समिति के मुताबिक देश के शीर्ष पदों का निर्णय लेने वाली इस सबसे शक्तिशाली समिति में शून्य महिला है। इसमें केवल दो पुरुष सदस्य हैं, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह।
समितियों में महिला नहीं
टॉप 8 कैबिनेट समितियों में से एक की भी अध्यक्षता महिला के पास नहीं है। निर्मला सीतारमण जैसे चेहरे केवल सदस्य के रूप में मौजूद हैं। संवैधानिक रिक्तियों की बात करें तो राष्ट्रीय महिला आयोग जैसे निकायों में पद महीनों रिक्त रहते हैं। यह ‘वंदन’ है या संस्थागत ‘रुदन’?
जमीनी सच्चाई कुछ और
असली जमीनी हकीकत कुछ और है, 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का वादा और इस हेतु विधेयक लाने से पहले, सरकार को अंकगणित समझ लेना चाहिए था, क्योंकि 2024 की सरकार में सिर्फ 9.7 प्रतिशत महिला मंत्री हैं।
चीख चीख कर ‘नारी शक्ति’ का नारा खोखला है, क्योंकि कैबिनेट सुरक्षा समिति में आज सिर्फ एक महिला (निर्मला सीतारमण) मौजूद हैं।
कांग्रेस में नारी शक्ति
नारियों को समान अधिकार देने को लेकर लगभग सभी दलों में आम सहमति है। देश में ‘नारी-विकास’ से आगे ‘नारी सशक्तिकरण’ और ‘नारी-नीत’ विकास की बात हो चुकी है। कांग्रेस ने तो इस नारे से दशकों पहले इस देश को इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व देकर और बाद में सोनिया गांधी को यूपीए की चेयरपर्सन बनाकर ‘नारी-नीत’ विकास की एक अमिट और लंबी रेखा खींच डाली थी।
इतिहास गवाह है कि कांग्रेस की ‘नारी शक्ति’ की लकीर बहुत गहरी है, इंदिरा गांधी का वह नेतृत्व जिन्होंने 1971 में बिना किसी इवेंट मैनेजमेंट के पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए।
जब वाकई था नारी सम्मान का जजबा
प्रतिभा पाटिल देश को पहली महिला राष्ट्रपति देने का श्रेय यूपीए को जाता है, सुचेता कृपलानी को पहली महिला मुख्यमंत्री बनाया और शीला दीक्षित ने 15 साल दिल्ली को विकास की नयी ऊंचाई दी। पंचायत आरक्षण अधिनियम 1993 में राजीव गांधी द्वारा लाया गया, 73वां और 74वां संशोधन ही वह आधार था जिसने आज 21 राज्यों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया है। इसीलिए जब राहुल गांधी इस अधिनियम की खामियों और ओबीसी कोटे पर सवाल उठाते हैं, तो उनका संदेह जायज लगता है कि कहीं इसके नाम पर दक्षिण भारत और पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी का हिस्सा चोरी तो नहीं किया जा रहा ?
परिसीमन और अपराधीकरण
विपक्ष की आंखों में धूल झोंकने के लिए सरकार ने 2023 के अधिनियम में एक ‘टाइम बम’ फिट किया है, आरक्षण तब लागू होगा जब जनगणना और परिसीमन पूरा होगा। इसके पीछे का मकसद ‘देरी की राजनीति’ और निर्वाचन क्षेत्रों के नक्शे के साथ चालाकी से छेड़छाड़ का डर है, असम इसका उदाहरण है।
नारियों के अपराधी सांसद हैं
वहीं नारी सुरक्षा की बात करने वाली पार्टियों का चरित्र 2024 के चुनाव में खुलकर सामने आया। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार, 18वीं लोकसभा में 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मामले हैं, जिनमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आरोपी भी शामिल हैं। बीजेपी में महिला विरोधी अपराधों के आरोपी सांसदों और विधायकों की संख्या (54) सबसे अधिक है।
वसुंधरा राजे से लेकर आनंदीबेन तक हाशिए पर नेतृत्व
सत्ता का दोहरा मापदंड उम्र के सवाल पर भी दिखता है। भाजपा की वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे खामोश हैं। आनंदीबेन पटेल को 2016 में 75 वर्ष की उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को कहा गया। किंतु आज स्वयं के मामले में मोदी सरकार के लिए उम्र कोई बाधा नहीं। जब संघ प्रमुख मोहन भागवत (जो किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं) ने सवाल उठाए, तो उन्हें ही रिटायर होने की नसीहत दे दी गई। आनंदीबेन को हटाने की असली वजह ‘मोदी-शाह’ की हाँ में हाँ न मिलाना और उनकी स्वतंत्र सोच थी।
शानदार लिफाफे के भीतर स्वार्थ के टेबलेट्स…
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम” एक खूबसूरत लिफाफा है जिसके अंदर ‘परिसीमन’ और ‘देरी’ की कड़वी गोलियां छिपी हैं। मनमोहन सिंह के दौर में बजट नारी शक्ति के लिए था, आज यस सर कहते रहने वालों के लिए है। संसद के विशेष सत्र (17 अप्रैल 2026) के दौरान इसे ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’ के रूप में पेश किया जाना क्या केवल ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस जैसी क्षेत्रीय शक्तियों को चुनौती देने की रणनीति है?
असली सशक्तिकरण होर्डिंग्स से नहीं, बल्कि संसद में भागीदारी और बजट में हिस्सेदारी से आता है। एक वाक्य में कहें तो “नारी वंदन का लिफाफा फाड़कर देखो, तो अंदर से निकलेगा संविधान की मूल भावनाओं के साथ किया गया राजनीतिक खिलवाड़, श्रेय की होड़ में कुर्सी प्रेम का जोड़ स्पष्ट नजर आता है।