
[ अजय कुमार ]
- भारत ने जेंडर की पहचान के लिए ‘सेल्फ़-आइडेंटिफ़िकेशन’ (खुद से पहचान बताने) की व्यवस्था खत्म की…
- 2 करोड़ ट्रांसजेंडर भारत में…
- कानूनी बदलावों से ट्रांसजेंडर हेल्थकेयर व्यवस्था पर असर पड़ा…
- डॉक्टरों को कानूनी कार्रवाई का डर, क्लीनिकों ने सेवाएँ रोकीं…
- एक्टिविस्ट्स का कहना है कि इन पाबंदियों से बिना रेगुलेशन वाले हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स बढ़ सकते हैं…
नई दिल्ली :
नये अधिनियमों का व्यवहारिक विरोध
ट्रांसजेंडरों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा, कल्याण और उन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए बनाया गया एक प्रमुख कानून है। संसद द्वारा 5 दिसंबर 2019 को पारित यह अधिनियम देश भर में लागू है।
यह अधिनियम किसी व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने (Self-perceived gender identity) का अधिकार देता है। इसके तहत, जिला मजिस्ट्रेट द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति को “पहचान का प्रमाण पत्र” जारी किया जाता है।
जरुरी इलाज रोक दिया गया
भारत की ट्रांसजेंडर महिला मेहर खान (बदला हुआ नाम) रूटीन हार्मोन थेरेपी अपॉइंटमेंट के लिए पहुँचीं, लेकिन उन्हें पता चला कि यह ज़रूरी इलाज रोक दिया गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हाल ही में कानून में बदलाव करके इन सेवाओं के लिए योग्य लोगों का दायरा सीमित कर दिया गया है।
मेडिकल स्टाफ में डर…
26 साल की इवेंट प्लानर ने कहा, “डॉक्टर असल में बस अपना चेहरा छिपा रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें।” उन्होंने यह भी बताया कि दक्षिणी शहर हैदराबाद के क्लिनिक में उन्होंने “स्टाफ के चेहरों पर डर” देखा।
खान उन अनेक भारतीयों में से एक हैं जिन्हें मार्च में लिंग पहचान के विकल्प को समाप्त किए जाने के बाद स्वास्थ्य सेवा से वंचित किया जा रहा है। अब लिंग पहचान को कानूनी मान्यता डॉक्टरों के एक पैनल द्वारा प्रमाणित किए जाने पर ही मिलेगी।
पारित अधिनियम में राष्ट्रीय समिति का गठन का प्रावधान – किन्तु…
लेकिन सरकार ने अभी तक ऐसे पैनलों में शामिल विशेषज्ञों की प्रकृति स्पष्ट नहीं की है, जिससे यह अनिश्चितता बनी हुई है कि वे राज्य या केंद्रीय अधिकारियों के प्रति जवाबदेह हैं या नहीं।
2026 के कानून से पहले, ट्रांसजेंडर लोग जेंडर-अफ़र्मिंग केयर देने वाले (जैसे सर्जन या साइकेट्रिस्ट) के पत्रों के आधार पर अपना जेंडर मार्कर बदलने के लिए ऑनलाइन अप्लाई कर सकते थे।
गलत फायदे उठाये जा रहे थे : भारत सरकार
भारत का कहना है कि इस बदलाव का मकसद वेलफ़ेयर फ़ायदों के गलत इस्तेमाल को रोकना और सुरक्षा बढ़ाना है, लेकिन एक्टिविस्ट और डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि इससे केयर देने वालों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है और कई लोग ज़रूरी दवाओं से वंचित हो सकते हैं।
सरकार और टाटा ट्रस्ट्स जो सब्रंग क्लिनिक को फ़ंड देता है, जहाँ खान का इलाज चल रहा था, ने बात करना ठीक नहीं समझा कोई जवाब नहीं दिया।
देखभाल की व्यवस्था पर असर
कम से कम एक दर्जन ट्रांसजेंडर लोगों ने मीडिया को बताया कि इस बदलाव से उनकी देखभाल की व्यवस्था पर असर पड़ा है, क्योंकि क्लीनिकों ने सेवाएँ रोक दी हैं और सर्जरी में देरी हो रही है।
पाँच डॉक्टरों ने कहा कि वे सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि कुछ सेवा प्रदाता ट्रांसजेंडर लोगों से यह घोषणा करने के लिए कहते हैं कि वे अपनी मर्ज़ी से इलाज करवा रहे हैं।
डाक्टर उलझन में…
सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली सीनियर वकील अरुंधति काटजू ने कहा, “डॉक्टर इस बात को लेकर बहुत परेशान और उलझन में हैं कि अब उन्हें किस तरह का इलाज करने की इजाज़त है।”
ट्रांसजेंडर के अधिकारों को निशाना बनाने वाला ग्लोबल ट्रेंड
यह बदलाव ट्रांसजेंडर इलाज पर रोक लगाने के ग्लोबल ट्रेंड के बीच आया है। हाल ही में अमेरिका ने जेंडर-अफ़र्मिंग केयर (लिंग-पुष्टि करने वाले इलाज) तक पहुँच को सीमित कर दिया है। वहीं, एशिया में थाईलैंड जैसे देश इस तरह के इलाज की ज़्यादा सुविधा तो देते हैं, लेकिन उन्हें कानूनी मान्यता सीमित ही मिलती है।
जो एक्टिविस्ट कभी भारत को इस तरह की मान्यता के मामले में प्रगतिशील मानते थे, उनका कहना है कि अब देश सरकारी निगरानी को और सख्त करने की दिशा में बढ़ रहा है।
इलाज रुका…2 करोड़ ट्रांसजेंडर भारत में…
दक्षिण भारत के टेक हब बेंगलुरु में, 24 साल की बिज़नेस डेवलपमेंट मैनेजर अनन्या बालमुरली ने बताया कि कानून में बदलाव के बाद, राजधानी नई दिल्ली के एक प्राइवेट क्लिनिक में जुलाई में होने वाली उनकी जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया गया।
केरल राज्य के कोझिकोड बंदरगाह शहर में, 30 साल की मेकअप आर्टिस्ट इचू ने बताया कि महीनों की बातचीत के बावजूद, एक सरकारी अस्पताल ने उनकी हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया।
उन्होंने आगे कहा कि डॉक्टर शुरू में “लेटर देने के लिए तैयार थे”, लेकिन एक बोर्ड मीटिंग के बाद उन्होंने मंज़ूरी वापस ले ली।
‘एसोसिएशन ऑफ़ ट्रांसजेंडर हेल्थ इन इंडिया’ का अनुमान है कि 1.4 अरब की आबादी में ट्रांसजेंडर लोगों की संख्या लगभग 2 करोड़ है, जो 2011 की हालिया जनगणना में बताई गई लगभग 5 लाख की संख्या से कहीं ज़्यादा है।