पश्चिम बंगाल एसआईआर : ट्रिब्यूनल जज के एक्शन से चुनाव आयोग की असलियत सामने आ गयी

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[ अजय कुमार ]

  • पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन में बड़ी गड़बड़ी…
  • संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव आयोग और सदस्यों की शक्तियों, कार्य, कार्यकाल, पात्रता का दुरुपयोग किया गया…
  • अपीलेट ट्रिब्यूनल से रिटायर्ड जस्टिस टीएस शिवगणनम ने दिया इस्तीफ़ा…
  • अपीलेट ट्रिब्यूनल के जजों की बात चुनाव आयोग ने नहीं मानी…

मतदाता सूची में हेराफेरी
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। जस्टिस (रिटायर्ड) टीएस शिवगणनम ने 1,717 वोटरों को मंजूरी दी, यह चुनाव आयोग के कुल आंकड़े से अधिक है। इसका अर्थ यह है कि बंगाल में वास्तविक वोटरों के नाम ज्यादा काटे गए।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विवाद के बीच एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में अपील ट्रिब्यूनल (Appellate Tribunal) से इस्तीफा देने वाले रिटायर्ड जस्टिस टीएस शिवगणनम ने अकेले ही इतने मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने की मंजूरी दी थी, जितने पूरे राज्य के लिए चुनाव आयोग की सप्लीमेंट्री सूची में भी नहीं थे, इससे साफ तौर पर पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में वास्तविक मतदाताओं के नाम जानबूझकर उड़ाए गए।
ट्रिब्यूनल पर ही उठे सवाल
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, मतदान खत्म होने से एक दिन पहले तक सिर्फ 1,607 अपीलों को मंजूर किया गया और वोटर लिस्ट में नाम जोड़े गए। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की जानकारी के अनुसार, जस्टिस शिवगणनम के ट्रिब्यूनल ने 5 अप्रैल से 27 अप्रैल के बीच 1,717 अपीलों को मंजूर कर लिया, कुल 19 ट्रिब्यूनलों में से केवल एक की यह संख्या होने से बाकी ट्रिब्यूनलों द्वारा मंजूर अपीलों पर सवाल उठ रहे हैं और यह भी कि इस तरह कितने और लोग वोट डाल पाए होंगे।
जस्टिस शिवगणनम ने दिया इस्तीफा

कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस टीएस शिवगणनम उन 19 रिटायर्ड जजों में शामिल थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) के तहत हटाए गए नामों की अपीलों की सुनवाई के लिए नियुक्त किया गया था। उन्होंने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे पता चलता है कि जस्टिस शिवगणनम ने वंचित मतदाताओं की अपीलों को गौर से सुना और अकेले उन्होंने इतनी भारी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम चुनाव आयोग की सप्लीमेंट्री मतदाता सूची में फिर से जुड़वाए।

मूल रूप से उन्हें नॉर्थ 24 परगना और कोलकाता की कुछ विधानसभाओं का क्षेत्राधिकार सौंपा गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नंदलाल बोस के परिवार के सदस्यों की अपीलों के लिए बिरभूम जिले का अतिरिक्त अधिकार क्षेत्र दिया गया था।
फरक्का कांग्रेस उम्मीदवार का मामला
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जस्टिस शिवगणनम ने फरक्का से कांग्रेस उम्मीदवार मोताब शेख की अपील को प्राथमिकता दी। उनके नाम को भी चुनाव आयोग की प्रक्रिया में काट दिया गया था। ट्रिब्यूनल ने उनके पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों को देखते हुए नाम बहाल कर दिया। आदेश में कहा गया कि “उपरोक्त रिकॉर्ड अधिनिर्णयन (adjudication) प्रक्रिया के दौरान ध्यान में नहीं लिए गए लगते हैं।”

नाम बहाल होने के बाद मोताब शेख ने नामांकन दाखिल किया और फरक्का सीट से चुनाव जीत गए।
विश्वास की कमी
सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच ‘विश्वास की कमी’ को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों को मतदाताओं की पात्रता तय करने का निर्देश दिया था। इस प्रक्रिया (SIR) के दौरान लगभग 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे, जिसे लेकर राज्य में भारी राजनीतिक विवाद हुआ था।
19 अपील ट्रिब्यूनल अधिसूचित
कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल की सिफारिश और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 20 मार्च को चुनाव आयोग ने 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल अधिसूचित किए, जिनमें पूर्व हाईकोर्ट जज शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि 21 अप्रैल तक ट्रिब्यूनलों द्वारा मंजूर नामों को पहले चरण (23 अप्रैल) और 27 अप्रैल तक मंजूर नामों को दूसरे चरण (29 अप्रैल) के लिए सप्लीमेन्ट्री लिस्ट में जोड़ा जाए।
27.16 लाख वोटर मतदान से वंचित
पहले चरण से पहले पश्चिम बंगाल मुख्य चुनाव आयुक्त मनोज अग्रवाल ने बताया कि सप्लीमेंट्री लिस्ट में सिर्फ 139 नाम जोड़े गए। दूसरे चरण से पहले 1,468 नाम जोड़े गए। बाकी 27.16 लाख नाम कटे रहने के कारण मतदान नहीं कर पाए। हालांकि 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि नाम हटाने और जोड़ने को लेकर तब तक 34 लाख अपीलें दायर हो चुकी थीं। लेकिन चुनाव आयोग अपनी मनमानी पर उतरा हुआ था।
भागते रहे चुनाव आयोग के अधिकारी
इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग से इस रिपोर्ट पर टिप्पणी के लिए अनुरोध किया था, लेकिन आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया। पश्चिम बंगाल के चुनाव आयुक्त मनोज अग्रवाल से भी संपर्क नहीं हो सका। बहरहाल, यह घटनाक्रम बंगाल चुनावों में वोटर लिस्ट संशोधन और अपील प्रक्रिया की पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े करता है।


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