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[ अजय कुमार ]

  • भारत की अर्थव्यवस्था इस समय कई चुनौतियों से जूझ रही है…
  • पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति पर उसके असर ने सरकार और विपक्ष के साथ आम जनता को चिंतित कर दिया है…

भले ही देश के सत्तारूढ़ दल के नेता पश्चिम एशिया में तनाव को अर्थ व्यवस्था चौपट होने का कारण बता रहे हैं, किन्तु यदि यह तनाव ना भी होता, तब भी भारत में यह परिस्थितियां होती ही, क्योंकि सरकार ने उद्योगपतियों की आर्थिक स्थिति पर ज्यादा जोर शुरू से देकर रखे हैं। प्रधानमंत्री के अकेले नोटबंदी का निर्णय और जीएसटी का गलत निर्धारण से ही अर्थ व्यवस्था कमजोर होने लगी थी।
मोदी की अपील से बढ़ा टेंशन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के भाषणों में जनता से ईंधन की बचत करने, खाद्य तेल का कम उपयोग करने, अनावश्यक विदेश यात्राएं रोकने और सोने की व्यर्थ खरीदारी घटाने की अपील की है। उन्होंने घर से काम करने, विद्युत वाहनों को बढ़ावा देने पर भी ज़ोर दिया।

उल्लेखनीय है कि भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, खाद्य तेल, सोना और उर्वरक एवं अन्य आवश्यक वस्तुएं विदेश से आयात करता है। आयातों एवं निर्यातों के मध्य असंतुलन विदेशी मुद्रा भंडार और भारतीय मुद्रा वैल्यू दोनों पर दबाव डाल रहा है। इसलिए सरकार बचत और आत्मनिर्भरता को बहुत ज़रूरी मान रही है।
किसानो पर सबसे अधिक दबाव
सबसे अधिक दबाव गांव और किसान पर दिखाई देता है। डीजल महंगा होने का सीधा असर खेती पर पड़ता है। ट्रैक्टर, सिंचाई, खाद ढुलाई और मंडी तक परिवहन सब कुछ महंगा हो जाता है। जब किसान की लागत बढ़ती है और फसल का उचित दाम नहीं मिलता तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होने लगती है। यही कारण है कि आज गांवों में खरीद क्षमता घट रही है और बाजारों में मंदी का असर दिख रहा है।
नेता प्रतिपक्ष की चेतावनी
दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में देश गंभीर आर्थिक मुश्किलों में फंस सकता है। उनका कहना है कि महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता का सबसे ज़्यादा बोझ आम लोगों, किसानों, मज़दूरों और छोटे व्यापारियों पर पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों का लाभ सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों तक ही पहुंच रहा है।
वित्तीय आपातकाल की चर्चा तेज
इन हालातों के बीच आर्थिक आपातकाल की चर्चा तेज़ हो गई है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 में इसका प्रावधान है। यदि राष्ट्रपति को महसूस हो कि देश की वित्तीय स्थिरता या साख पर संकट उत्तपन्न हो गया है, तो वे आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं, इस घोषणा को 60 दिन के भीतर संसद की मंजूरी मिलना ज़रूरी होता है।
अधिकार केन्द्रीकृत किये गये
आर्थिक आपातकाल लागू होने पर केंद्र सरकार की शक्तियों में वृद्धि हो जाती हैं, हालांकि पिछले 10-12 वर्षों से भाजपा सरकार ने सारे अधिकार अपने पास सुरक्षित रखे हुये हैं और कार्यपालिका पर पकड़ रखकर, कई असंवैधानिक निर्णय लिये, जिसकी वजह से धीरे धीरे यह परिस्थिति उत्पन्न हुई, जिसमें वित्तीय आपातकाल की चर्चा होने लगी है। देश के अर्थशास्त्री और व्यावसायिक मुद्दों के जानकारों के मुताबिक सही रणनीतिक कदम ना उठाये जाने के कारण ही वित्तीय आपातकाल की चर्चा जोरों पर है।
राज्यों पर वित्तीय अनुशासन
वित्तीय आपातकाल की स्थिति में केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को वित्तीय अनुशासन का पालन करने के निर्देश दिए जा सकते हैं, राज्यों के वित्तीय निर्णयों पर केंद्र का नियंत्रण मज़बूत हो सकता है। सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों में कटौती भी की जा सकती है। राज्यों के धन संबंधी विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए रोका जा सकता है।

हालांकि भारत के इतिहास में अब तक कभी आर्थिक आपातकाल नहीं लगा है। राष्ट्रीय आपातकाल और राष्ट्रपति शासन कई बार लगा, लेकिन आर्थिक आपातकाल की नौबत कभी नहीं आई।
प्रणाली संसदीय किन्तु एकल निर्णय से…
हमारी शासन व्यवस्था संसदीय प्रणाली पर टिकी है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। इसलिए यदि कभी यह घोषणा होती है तो वास्तविक निर्णय प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद ही लेगा। राष्ट्रपति सिर्फ़ औपचारिक घोषणा करेंगे।
वैसे जनता के सेवक कहे जाने वाले जनता से निर्वाचित समस्त सदस्यों के पेंशन एवं भत्तों में यदि कटौती कर ली जाए तो शायद सामान्य जनता से अपील की जाने वाली कुछ एक समस्याओं का समाधान संभव है।

जब सामान्य जनता मात्र ₹200 में पूरे एक महीने अपने संचार व्यवस्था को बहाल कर सकता है तो माननीय निर्वाचित समस्त सदस्यों को संचार के मद में ₹200 से अधिक का भत्ता अनुमन्य करना कहीं से तार्किक एवं नैतिक नहीं लगता। इसी प्रकार यदि एक ऐसा सरकारी सेवक जो अपने जीवन का 30 से 40 वर्ष सरकार की सेवाओं में रहता है और उसे सामाजिक सुरक्षा के रूप में पेंशन देना उचित नहीं लगता है, तो चंद दिनों के लिए निर्वाचित सदस्यों को, जितनी बार निर्वाचित होते हैं उतनी बार पेंशन देना किसी भी तरह से तार्किक एवं नैतिक नहीं है।
यदि उनकी पेंशन भत्ते पर उचित तरीके से प्रतिबंध लगाया जाए तो शायद देश इस वर्तमान आर्थिक संकट से थोड़ा उबर सकता है।
आर्थिक आपातकाल पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत आर्थिक आपातकाल की ओर बढ़ रहा है। चुनौतियां ज़रूर हैं, बढ़ता तेल आयात खर्च, रुपये पर दबाव और वैश्विक अस्थिरता। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है ऐसा दावा तो किया जाता है किन्तु वास्तविक व्यवस्था, दावों से बिलकुल अलग है। यद्यपि सरकार स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही है। फिर भी देश के नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए।
लोकतंत्र कमजोर हुआ
लोकतंत्र में जनता को सरकार की आर्थिक नीतियों पर नज़र रखनी चाहिए और पारदर्शिता तथा अपनी भागीदारी की मांग करनी चाहिए, किन्तु मोदी सरकार में ऐसा प्रतीत होता है कि जनता के अधिकार को निलंबित कर दिया गया है, यह सत्तारूढ़ दल के डर कारण ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती है।
दूरदर्शी नीतियों के अभाव का प्रभाव
किसी भी आर्थिक संकट का स्थायी हल कठोर नियंत्रण या आपातकाल से नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीतियों, सही सुधारों और जनता के विश्वास से ही निकलता है, परंतु भारत में फिलहाल जनसाधारण का विश्वास सरकार और प्रशासन पर नहीं है, ऐसा महसूस होता है क्योंकि सत्ताधारी दल के जमीनी कार्यकर्ताओं में ही विश्वास की कमी दिख रहा है।


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