
[ अजय कुमार ]
- बकरीद क़रीब आ गई है…
- हिन्दूओं को पहले पता चल जाता है…
- हिन्दुत्वादी नेता पहले ही बता देते हैं कि मुसलमानों को त्यौहार कैसे मनाना है…
नेताओं की चेतावनी…
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, उसकी सरकारों के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के बयान आने लगे, जिनमें मुसलमानों को धमकी और चेतावनी दी जा रही है।
अब ईद, बक़रीद का इंतज़ार जितना मुसलमान नहीं करते, उससे ज्यादा हिंदुत्ववादी करते हैं। हिन्दुओं की उत्तेजना इन त्योहारों के पास आते ही बढ़ जाती है। आपको किसी मौलवी से पूछने की ज़रूरत नहीं कि ईद बकरीद कब है, हिंदुत्ववादियों के बयानों को सुनकर, पढ़कर आप अनुमान कर सकते हैं कि मुसलमानों का कोई त्यौहार क़रीब आ रहा है। वे कोई बधाई, शुभेच्छा वाले बयान नहीं होते, यह बताने कहने की ज़रूरत नहीं।
विचारक और स्तंभकार अपूर्वानंद पूछ रहे हैं कि सिर्फ मुस्लिम त्यौहारों पर ही यह सब क्यों होता है?
भाजपा नेताओं के बयानों से मालूम हुआ…
भाजपा और हिन्दुत्ववादी नेताओं के बयानों से सबको मालूम हो गया है कि 28 मई को बकरीद है! क्योंकि ईद के पहले मुसलमानों को चेतावनी दिया जा रहा है।
सबसे पहले मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी धमकी दे चुके हैं कि किसी को सड़क पर नमाज़ पढ़ने नहीं दी जाएगी। गाय की कुर्बानी न करने का हुक्म भी जारी किया गया।
बक़रीद के पहले ऐलान किया गया कि दो दिन की छुट्टी अब सिर्फ़ एक दिन की होगी, गौ-हत्या को लेकर नियम और ज्यादा सख्त हो चुके हैं। एनिमल्स स्लॉटर कंट्रोल एक्ट, 1950 को सख्ती से लागू किया गया है। इस वजह से पूरे बंगाल में गाय का कारोबार करना मुश्किल हो गया है। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री के खिलाफ अब गौ-पालक हिन्दू सड़कों पर आंदोलित है, वहीं मुसलमानों ने कुर्बानी के लिये, गाय ना खरीदने की ठान ली है, इसलिए तनाव उत्पन्न हो गया है।
समझ ना आया तो…योगी
कुर्बानी कायदे से हो…हेमन्ता
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को चेतावनी दी कि वे सड़क पर नमाज़ नहीं पढ़ने देंगे, अगर वे बात नहीं माने तो दूसरे तरीके से उनको समझाया जाएगा। दूसरा तरीक़ा क्या है, हम सब जानते हैं।
असम के मुख्यमंत्री ने कुर्बानी क़ायदे से करने की सलाह दी, उन्होंने मुसलमानों के उन बयानों की सराहना की, जिनमें उन्होंने गाय की कुर्बानी न करने की अपील की है। सरमा ने कहा कि बक़रीद को पूरी तरह कुर्बानी से मुक्त करना चाहिए।
सनातन धर्म का सम्मान कर रहे मुसलमान
मुसलमान सनातन भावना का सम्मान कर रहे हैं, इससे समाज में शांति रहेगी, दिल्ली के भाजपा के नेताओं ने भी कुर्बानी और नमाज़ क़ायदे से करने की चेतावनी दी है।
ऐसे वीडियो दिखलाई दे रहे हैं, जिनमें गाड़ियों को रोक कर उनपर हमला किया जा रहा है। आरोप है कि उनमें गैरक़ानूनी तरीक़े से गायें, कुर्बानी के लिए ले जाई जा रही हैं। बात अब गायों तक सीमित नहीं है, बकरों को भी ज़ब्त किया जा रहा है। दिल्ली में बक़रीद के पहले नेहरू हिल पार्क में सार्वजनिक गतिविधि पर रोक लगा दी गई क्योंकि अंदेशा था कि वहाँ इस बहाने बकरों की ख़रीदी बिक्री होगी।
पत्रकार कुर्बानी का स्वरूप देखने मक्का पहुंचा
एक टीवी चैनल ने मक्का जाकर पता किया कि वहाँ गाय और ऊँट की कुर्बानी तो नहीं दी जा रही है, ये टीवी चैनल ग़ाज़ा नहीं गये, जब वहाँ बच्चे क़त्ल किए जा रहे थे या सूडान, जहाँ क़त्लेआम चल रहा है। लेकिन बक़रीद के पहले इतनी महत्त्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करने मक्का जाने की ज़हमत उन्होंने उठाई।
“पेटा” का पेट कब भरेगा
जानवरों को लेकर फ़िक्रमंद संस्था ‘पेटा’ ने एक अभियान शुरू किया जिसमें एक बकरा लोगों से अपील कर रहा है कि उसकी कुर्बानी न की जाए। इसमें बच्चे रुक रुक कर उसे दुलार कर रहे हैं। क्या कोई इतना बेरहम होगा कि ऐसे बेजुबान की कुर्बानी दे? यह अभियान बक़रीद के ठीक पहले चलाया गया है।
क्या ‘पेटा’ कामरूप कामाख्या में कभी इस तरह का अभियान चला सकता है? झारखंड के देवघर में क्या वह यह अभियान चला सकता है जहाँ यज्ञोपवीत, जनेऊ संस्कार, विवाह आदि शुभ कार्यों में एक ही घर में एक से अधिक बली दी जाती हैं? आज तक उसने यह नहीं किया है। ‘पेटा’ के इस अभियान में जितनी बकरों के प्रति करुणा नहीं है, उतनी मुसलमानों के प्रति घृणा है। वह अप्रत्यक्ष है लेकिन उसे महसूस करना क़तई कठिन नहीं है।
मुस्लिमों पर हमले…होते ही रहते हैं
यों तो अब साल भर मुसलमानों पर हमले होते रहते हैं, सड़क पर, रेस्तराँ में, ट्रेन या बस में, कहीं भी, किसी भी वक्त किसी न किसी बहाने उनपर हमला किया जा सकता है। लेकिन बक़रीद के पहले मुसलमान विरोधी घृणा अभियान में ख़ास उत्साह आ जाता है।
मुस्लिमों के लिये सड़क पर कानून और हिन्दुओं के लिये…
तकलीफ़ इस बात की है कि भले हिंदू भी इस मुसलमान विरोधी नफ़रत को देख या महसूस नहीं कर पाते, हिंदुओं में बहुतेरे हैं जो मासूमियत से पूछते हैं कि भला सड़क पर नमाज़ क्यों पढ़ी जानी चाहिए। वे इस पर पाबंदी को यातायात सुगम बनाए जाने के लिए वाजिब मानते हैं। वे यह नहीं पूछते कि हर मंगलवार को प्रायः हनुमान मंदिरों के सामने की सड़कें घंटों तक क्यों जाम हो जाती हैं।
हिंदुओं के हर त्योहार में सड़क घेर कर मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। गणेश चतुर्थी हो, रथयात्रा हो, राम नवमी हो, दुर्गा पूजा हो, सरस्वती पूजा, महावीरी अखाड़ा, हनुमान जयंती, आदि-इत्यादि, हर मौक़े पर एक दिन नहीं कई दिनों तक सड़कों को घेर लिया जाता है और जुलूस निकाले जाते हैं। महीने भर चलनेवाली कांवड़ यात्रा को तो भूल ही जाइए, जिसमें पूरी की पूरी सड़क घेर ली जाती है, और वह भी आधिकारिक तौर पर?
किसी नेता ने नहीं कहा…
क्या आपने कभी हिंदू मुख्यमंत्रियों को हिंदू त्योहारों के वक्त इस तरह की अपील करते सुना है कि पूजा मंदिरों में ही होनी चाहिए, जो हर कुछ कदम पर बने हुए हैं? क्या कभी इस तरह की चेतावानी हिंदू त्योहारों पर दी गई है कि हिंदू अपने पर्व ऐसे मनाएँ कि दूसरों को असुविधा न हो ?
मुसलमान अपने त्योहार में कोई शोर शराबा नहीं करते, ईसाई भी नहीं। वे कभी मंदिरों के सामने जाकर कुर्बानी नहीं करते। मुहर्रम में भी वे मंदिरों के आगे जाकर मातम नहीं करते। हिंदू ज़रूर मस्जिदों के सामने बाजा बजाना चाहते हैं, मस्जिदों में घुसना चाहते हैं, उनके धार्मिक प्रतीकों को अपवित्र करना चाहते हैं। ऐसा किए बिना, अब उन्हें पूरा धार्मिक आंनद नहीं मिलता।
बिना हो-हल्ला के…
मुसलमान त्योहारों में मुसलमानों का संयम देखा जाता है, लेकिन दुर्भाग्य से इन अवसरों पर हिंदू समाज की भीतरी विकृति गटर की गंदगी की तरह बहने लगती है।
मुसलमानों को चैन से अपना त्योहार नहीं मनाने देने में कौन सी ख़ुशी मिलती है, और क्यों? क्या हिंदू समाज अपनी इस ग्रंथि पर कभी बात करेगा? क्यों हिन्दू संस्कृति को बदनाम करते हैं।
हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ किन्तु हिन्दूवादी…
जबकि पूरी दुनिया में हिंदू संस्कृति केवल एक धर्म नहीं, बल्कि मुख्य रूप से एक समावेशी जीवन पद्धति है, यह हजारों वर्षों से विकसित हुई मानवीय मूल्यों, दर्शन, परंपराओं और आध्यात्मिक मान्यताओं का एक अनूठा मिश्रण है, जो सत्य, अहिंसा, और प्रकृति के साथ-साथ पशु-पक्षियों से तालमेल पर आधारित है।