पत्रकारों के सवालों से डरते हैं भाजपा नेतागण

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[ अजय कुमार ]


पत्रकारों को बैठक से बाहर किया…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आयोजित दिशा (DISHA) बैठक के दौरान केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंग पुरी का पत्रकारों के साथ व्यवहार चर्चा में आ गया है।

जानकारी के मुताबिक, विकास योजनाओं की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक के दौरान किसी बात पर मंत्री हरदीप पुरी नाराज हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उन्होंने बैठक कक्ष में मौजूद पत्रकारों से कहा, “चलो भैया, बहुत हो गया… निकलो यहां से।” इसके बाद पत्रकारों को मीटिंग हॉल से बाहर कर दिया गया।

परिवार की सोचो…योगी
योगी आदित्यनाथ कहतें हैं, परिवार के ऊपर रहम करो यार। सरकार और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ सवाल दागना बंद करो पंकज, नहीं तो किसी ना किसी किनारे कोने पर गौरी लंकेश के भाई बनकर के पड़े रह जाओगे।

दूसरा एक पत्रकार था मिर्ज़ापुर में, एकदम सही रिपोर्ट दिखाया था, गरीब बच्चों को मिड-डे मील में रोटी और नमक मिल रहा था, वो जेल चला गया।

स्मृति ईरानी ने अमेठी में दैनिक भास्कर के एक पत्रकार को नौकरी से निकलवा दी, पत्रकार ने अमेठी के विकास और संसदीय क्षेत्र से लगातार गायब रहने पर सवाल किया था।

पुलिस बुला लूंगा…गडकरी
सत्ता की ठसक में डूबे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का पत्रकारों से दुर्व्यवहार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह एक पत्रकार पर नाराज होते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में गडकरी कथित तौर पर कहते सुनाई दे रहे हैं, “अबे शांत रख, पुलिस बुलाकर बाहर निकाल दूंगा।”

बताया जा रहा है कि यह घटना एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हुई, जहां किसी सवाल या बातचीत को लेकर केंद्रीय मंत्री और पत्रकार के बीच तीखी बहस हो गई। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर प्रेस की स्वतंत्रता और नेताओं के रवैये को लेकर बहस शुरू हो गई है।

सवाल : पत्रकारिता स्वतंत्र क्यों नहीं


इस घटना को भारत की प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर लोग यह भी लिख रहे हैं कि जब पत्रकारों को सवाल पूछने पर पुलिस बुलाने की धमकी दी जाएगी, तो स्वतंत्र पत्रकारिता कैसे मजबूत होगी।

भारत 180 देशों में 157वें नंबर पर…
भारत की रैंकिंग को लेकर भी चर्चा हो रही है। अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स (RWB) द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर रहा है, आलोचकों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं प्रेस और सत्ता के रिश्तों पर सवाल खड़े करती हैं। सोशल मीडिया में लोग पूछ रहे हैं कि आखिर प्रधानमंत्री मीडिया का सामना क्यों नहीं करते? मीडिया से वही नेता डरता है जो झूठ बोलता है, मीडिया के सामने सच आना मतलब देश की जनता को सच्चाई मालूम होना।

नार्वे में मोदी का कार्टून


मोदीजी का ऐसा कार्टून भारत के किसी अखबार में छपता तो क्या होता?

असल समस्या यह नहीं है कि नॉर्वे के अखबार ने मोदी जी पर कार्टून क्यों छापा। असल समस्या यह है कि भारत में लोग अब इतने “मैनेज्ड मीडिया” के आदी हो चुके हैं कि उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता असभ्यता लगने लगी है।

नार्वे में अखबार सरकार के डर से नहीं चलते, वे यह सोचकर खबर नहीं छापते कि “विज्ञापन बंद हो जाएगा”, “ईडी आ जाएगी”, “आईटी रेड पड़ जाएगी” या “देशद्रोही घोषित कर दिए जाएंगे।”

कभी नेहरुजी के कार्टून छपते थे
इसलिए वहाँ प्रधानमंत्री पर भी कार्टून भी बनता है, जैसे एक जमाने में भारत में नेहरू जी का कार्टून छपते थे और नेहरू जी कार्टूनिस्ट को सम्मानित करते थे।

पत्रकारिता में आलोचना भी होती है और कठिन सवाल भी पूछे जाते हैं। और सबसे बड़ी बात, सरकार इसे लोकतंत्र का हिस्सा मानती है, राष्ट्रीय अपमान नहीं।
आज नेता अपने आप को…
भारत में पिछले कुछ वर्षों में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि नेता की आलोचना करना मानो देश की आलोचना हो, अपने को देश से ऊपर समझने वाले नेताओं की फौज खड़ी हो चुकी है, जो लोकतंत्र का सर्वनाश करने की ठान रखे हैं।

टीवी चैनल पत्रकारिता कम और भक्ति ज्यादा करते दिखाई देते हैं, कठिन सवाल पूछने वाला पत्रकार “एजेंट” कहलाता है और चापलूसी करने वाला “राष्ट्रवादी”।

यही कारण है कि अब लोगों को स्वतंत्र प्रेस अजीब लगने लगी है, भारतीय जनता अब झूठ को सच मानने मजबूर हो चुकी है।

यदि किसी भारतीय अखबार ने ऐसा कार्टून छापा होता, तो क्या होता?
ट्रोल आर्मी टूट पड़ती। “हिंदू विरोधी”, “भारत विरोधी”, “विदेशी एजेंट” के नारे शुरू हो जाते। सरकारी विज्ञापन बंद होने की चर्चा शुरू हो जाती। और टीवी चैनल कई दिनों तक “राष्ट्र का अपमान” चलाते रहते।

नेता भगवान नहीं
लेकिन लोकतंत्र में नेता भगवान नहीं होता। वह जनता का प्रतिनिधि होता है, उसकी आलोचना भी होगी, व्यंग्य भी होगा और सवाल भी होंगे। असल में मजबूत नेता वह नहीं जो केवल प्रशंसा सुने। मजबूत नेता वह होता है जो आलोचना सह सके।


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