
[ अजय कुमार ]
- पूर्व जज यशवंत वर्मा पर अब भी चल सकता है महाभियोग
- लोकसभा अध्यक्ष ने दिया संकेत
- जस्टिस वर्मा पहले ही दे चुके हैं अपना इस्तीफा
जांच समिति की रिपोर्ट
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने बताया है कि 20 जुलाई को पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच समिति की रिपोर्ट पेश की जाएगी। चूंकि जज यशवंत वर्मा अप्रैल में ही इस्तीफा दे चुके हैं और ऐसे में अगर उनके खिलाफ महाभियोग चलाया जाता है तो इसका क्या अर्थ निकाला जाये !
लोकसभा स्पीकर ने कहा है कि दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाली तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट मानसून सत्र के पहले ही दिन मतलब 20 जुलाई को लोकसभा में पेश की जाएगी। जज वर्मा की पेंशन भी अबतक रिलीज नहीं की गई है। अब सवाल यह है कि क्या इस्तीफा देने के बाद भी उनके खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है?
महाभियोग के लिए सभी पक्षों ने किया था हस्ताक्षर
सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने ही जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि इस्तीफे के बाद भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के पोर्टल में कार्यरत जजों की सूची में उनका नाम बना हुआ है। माना जाता है कि महाभियोग चलाकर उनका नाम लिस्ट से हटाया जा सकता है। बता दें कि पिछले साल मार्च में उनके आवास पर आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में जले हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं। उनका कहना था कि ये नोट उनके नहीं हैं बल्कि उनकी छवि धूमिल करने के लिए साजिश की गई है।https://www.allahabadhighcourt.in/service/judgeListSeni.jsp
क्या महाभियोग चलाया जायेगा ?
जांच रिपोर्ट पेश किए जाने के बाद क्या पूर्व जज के खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है? महाभियोग का उद्देश्य ही जज को पद से हटाना होता है जो कि वह पहले से ही छोड़ चुके हैं। ऐसे में कानूनी तौर पर स्थिति स्पष्ट नहीं है। जस्टिस वर्मा ने बार काउंसिल में पंजीयन कराकर प्राइवेट प्रैक्टिस भी शुरू कर दी है।
जुलाई 2025 में दोनों सदनों में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था। लोकसभा में इसे स्वीकार किया गया और जांच समिति का गठन किया गया। वहीं राज्य सभा में प्रस्ताव गिर गया।
जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के करीब तीन महीने के बाद स्पीकर ने रिपोर्ट पेश करने का ऐलान किया है, इस बार संसद के सामने कई कानूनी चुनौतियां भी हैं।
पहले के ऐसे ही मामलों में क्या हुआ
2011 में जस्टिस पीडी दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। महाभियोग के दौरान ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया और फिर पैनल को भंग कर दिया गया था। इसी तरह जस्टिस सौमित्र सेने के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पास हुआ था, उन्होंने लोकसभा में वोटिंग से पहले ही इस्तीफा दे दिया और फिर महाभियोग की प्रक्रिया बंद कर दी गयी थी।
जज का इस्तीफा तुरंत प्रभावी माना जाता है
वहीं 1978 की संवैधानिक पीठ के मुताबिक यदि कोई हाईकोर्ट का जज इस्तीफा देता है तो इसे अथॉरिटी स्वीकार करे या ना करे, उसी तारीख से इसे प्रभावी माना जाता है। जबकि अन्य सरकारी कर्मचारियों के मामले में इस्तीफा तब तक नहीं माना जाता है जब तक कि संबंधित अथॉरिटी इसे स्वीकार ना करे। इस्तीफे के बाद से जस्टिस वर्मा ने कोई भी न्यायिक काम नहीं किया है। उन्होंने अपने अधिकारों, सुविधाओं, वाहन और आवास को भी सरेंडर कर दिया है। उनकी सैलरी को सीज कर दिया गया है और पेंशन भी नहीं रिलीज की गई है।
जज का इस्तीफा अन्य सरकारी अधिकारियों से अलग होता है
संविधान के आर्टिकल 217 के मुताबिक अगर हाई कोर्ट का कोई जज राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए साइन वाला त्यागपत्र भेजता है, तो इसे स्वीकार ही माना जाता है। भारत सरकार बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा केस में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि जजों के पास एकतरफा संवैधानिक अधिकार है। जज एक संवैधानिक पदाधकारी है ना कि कोई कर्मचारी। इसलिए उनका एकतरफा इस्तीफा भी मंजूर माना जाएगा।