कर्नाटक राज्य सरकार विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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[ अजय कुमार ]

कागज तो दिखाना पड़ेगा…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रजिस्ट्रेशन को लेकर कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खरगे ( सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री ) और संघ के बीच विवाद तेज हो गया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत को खुले पत्र लिखने के बाद अब प्रियांक खड़गे ने फिर से संघ के रजिस्ट्रेशन पेपर सार्वजनिक करने की मांग की है। मीडिया बातचीत के दौरान खरगे ने कहा कि अगर आरएसएस के पास कानूनी दस्तावेज हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए।

खड़गे ने कहा कि उनका सवाल पूरी तरह संवैधानिक है और उन्होंने कहीं भी संगठन पर प्रतिबंध लगाने की बात नहीं कही। उनका बयान ऐसे समय आया है जब आरएसएस अपने 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है और संगठन की कानूनी स्थिति को लेकर बहस शुरू हो गई है।

मोहन भागवत और संघ सही निकले तो मैं माफी मांगूंगा – प्रियांक खरगे…
प्रियांक खरगे ने संघ प्रमुख को लिखे अपने पत्र का जिक्र करते हुए कहा कि पत्र बिल्कुल साफ है। मेरे राज्य में उन्होंने 500 से ज्यादा यूनिफॉर्म मार्च किए हैं और रोजाना 4 हजार से ज्यादा शाखाएं चल रही हैं। मैं सिर्फ यह पूछ रहा हूं कि जब आप रजिस्टर्ड संगठन नहीं हैं तो किस कानून के तहत काम कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि मुझे इसमें कुछ भी गैरतार्किक या असंवैधानिक नहीं दिखता। अगर आपके पास कागज हैं तो मेरे मुंह पर फेंक कर मारो। अगर उनका स्पष्टीकरण सही निकला तो मैं माफी मांगूंगा। अगर उनका स्पष्टीकरण सही नहीं है तो उन्हें माफी मांगनी चाहिए। खरगे ने साफ किया कि उन्होंने पत्र में कहीं भी आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने या कर्नाटक सरकार द्वारा बैन की बात नहीं लिखी।


खरगे ने संघ प्रमुख को लिखा था पत्र
कर्नाटक मंत्री ने कहा कि किसी भी संगठन को संविधान के तहत ही काम करना चाहिए। उन्होंने आगे यह भी सवाल किया कि क्या मैंने कब हिंदू धर्म के रजिस्ट्रेशन की बात की है। खरगे ने आगे कहा कि यह एक संगठन है और किसी भी संगठन को संविधान के दायरे में ही काम करना चाहिए। बता दें कि हाल ही में प्रियांक खरने ने संघ प्रमुख को खुला पत्र लिखकर उसके रिजस्ट्रेशन के कागज सार्वजनिक करने की मांग की थी।

संवैधानिक जवाबदेही दिखाए संघ – खरगे…
कर्नाटक मंत्री ने अपने खुले पत्र में लिखा था कि जिस संगठन के पास 60 हजार से ज्यादा शाखाएं और करोड़ों स्वयंसेवक होने का दावा है, उसे पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही भी दिखानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नागरिक, ट्रस्ट, एनजीओ, कंपनियां और मंदिरों को कानून के तहत रजिस्ट्रेशन और वित्तीय जानकारी देनी पड़ती है, तो आरएसएस इससे अलग क्यों रहे। खरगे ने अपने पत्र में दावा किया था कि कर्नाटक में आरएसएस की 4,127 दैनिक शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन और 562 रूट मार्च आयोजित किए गए हैं।

मोहन भागवत ने जवाब देने से इनकार किया…
प्रियांक खरगे के इस पत्र का जवाब देने से इनकार करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया था। उन्होंने कहा कि संघ खुलकर काम करता है और इसमें कुछ भी गुप्त नहीं है। भागवत ने कहा कि हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है और आरएसएस का संविधान 1950 के दशक में सरकार को सौंपा जा चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने अतीत में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था, जिससे यह स्पष्ट है कि सरकार संगठन के अस्तित्व को मान्यता देती है।

भागवत का कथन गलत…
मोहन भागवत का यह कथन पूर्णतः गलत है कि हिन्दू धर्म भी पंजीकृत नहीं है, जबकि सच यह है कि
भारत में किसी भी धर्म को कानूनी रूप से “पंजीकृत” नहीं किया जाता है, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष (secular) देश है। यहाँ किसी भी धर्म को सरकारी तौर पर मान्यता देने या रजिस्टर करने की प्रक्रिया नहीं है। सभी नागरिकों को भारत के संविधान द्वारा अपने धर्म का स्वतंत्र रूप से पालन करने का अधिकार प्राप्त है। हालाँकि, भारतीय संविधान और कानून (जनगणना सहित) में निम्नलिखित प्रमुख धर्मों को माना और मान्यता दी गई है, ये धर्म जैसे हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म।

संघ पर तीन बार प्रतिबंध…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर भारत भर में तीन बार प्रतिबंध लगाया गया है। इस संगठन पर पहली बार 1948 में महात्मा गांधी की हत्या में कथित संलिप्तता के आरोप में प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद आपातकाल के दौरान 1975 में और अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद 1992 में इस पर प्रतिबंध लगाया गया । तीनों प्रतिबंध क्रमशः 1949, 1977 और 1993 में हटा लिए गए थे।

फिर भारतीय जनता से कागज क्यों मांगे जा रहे हैं…
सच तो यह भी है कि जब आरएसएस से रजिस्ट्रेशन के कागजात मांगे जा रहे हैं तो सीधे जवाब देने के बजाय इधर उधर की बातें या उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, यह सबकुछ हमारे देश में कैसे हो सकता है, जबकि इसी संघ समर्थित राजनीतिक दल ( भाजपा ) की सरकार देश की जनता से नागरिकता प्रमाणित करने कागजातों की मांग कर रही है और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से आम जनता के अधिकारों का हनन कर रही है, यहां तक मतदान के अधिकार भी छीने जा रहे हैं।

भागवत पशुपालन विषय में स्नातक…इसीलिए
मोहन भागवत की शिक्षा पर कहीं सवाल नहीं उठाये जा रहे हैं क्योंकि संघ प्रमुख भागवत ने पशु चिकित्सा और पशुपालन (Veterinary Sciences and Animal Husbandry) में स्नातक की डिग्री हासिल की है और वेटरनरी साइंसेज में पोस्ट-ग्रेजुएशन (मास्टर्स) में भी दाखिला लिया था, लेकिन 1975 में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक (प्रचारक) बन गये, अब जनता यह पूछ रही है कि भागवत जी चूंकि पशु चिकित्सा एवं पशुपालन विषय में स्नातक हैं तो देश की जनता को भी पशु समझ रहे हैं क्या ?


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