भारतीय तेल कंपनियों का डेटा : झूठ बोल रहे नेता

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[ अजय कुमार ]

  • तेल कंपनियां कमा रही हैं मुनाफा…
  • चौथी तिमाही में ही 41 प्रतिशत शुद्ध लाभ…
  • फिर जनता से लूट-खसोट क्यों ?…

नई दिल्ली :
वैश्विक कच्चे तेल की उतरती-चढ़ती कीमतों के बावजूद, भारत की सरकारी तेल कंपनियों आईओसी, एचपीसीएल और बीपीसीएल ने चौथी तिमाही में संयुक्त रूप से ₹19,470 करोड़ का शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो 41 प्रतिशत की वृद्धि है। इसके बावजूद जनता की जेब पर नज़र है।
चार दिन पहले की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मोदी सरकार नियंत्रित तेल कंपनियों का मुनाफा बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद तेल के दाम आज सोमवार 25 मई को चौथी बार बढ़ा दिए गए।
मीडिया रिपोर्ट्स
द हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, इकानाॅमिक्स टाइम्स ने बताया है कि देश के घरेलू फ्यूल रिटेल बाजार पर 90 प्रतिशत से ज्यादा नियंत्रण रखने वाली तीन मुख्य सरकारी तेल कंपनियों ने जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है। इस चौथी तिमाही में इन कंपनियों का संयुक्त शुद्ध मुनाफा, बीते वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 40.74 प्रतिशत (लगभग 41 प्रतिशत) बढ़कर 19,470 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।
पश्चिम एशिया संघर्ष से पहले और बाद में…
अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमला किया था। इसके बाद ईरान ने होर्मुज बंद कर दिया, तीनों भारतीय तेल कंपनियों के संयुक्त शुद्ध लाभ में 2025-26 में 130 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो ₹77,280.65 करोड़ तक पहुंच गया, जबकि 2024-25 में यह ₹33,601.57 करोड़ था। सरकार और तेल कंपनियों ने फौरन ग्लोबल मार्केट में तेल महंगा होने का हवाला देना शुरू किया, हालांकि सीज़फायर के बाद तेल की कीमतें बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी। अभी जब आज सोमवार को यह रिपोर्ट तैयार की जा रही है, तब भी तेल की कीमतें कम हुई हैं, मार्च 2026 में वैश्विक तेल आपूर्ति में रुकावट के बावजूद यह वृद्धि दर्ज की गई है।

इन आंकड़ों का मतलब ये है कि पिछले साल हुए मुनाफे के मुकाबले, देश के लोगों से करीब 130 प्रतिशत की और ज्यादा उगाही और कमाई की गई।
वैश्विक तेल में आठ प्रतिशत की कमी : फिर भी भारत में कीमतें बढ़ी
सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 8 प्रतिशत लुढ़ककर, $100 प्रति बैरलके नीचे $96.83 पर आ गिरा है। जबकि भारत में खुदरा पेट्रोल की कीमतों में 7 प्रतिशत और डीजल में 8.6 प्रतिशत की वृद्धि की गयी।

आज (25 मई 2026) पेट्रोल का रेट ₹2.61 जबकि डीजल का रेट ₹2.71 बढ़ा दिया, जिससे 10 दिन और 4 किस्तों में डीजल और पेट्रोल लगभग 7.50 रुपए प्रति लीटर महंगा हो गया है। अब जो तेल का रेट गिरा, उसके संदर्भ में तेल कंपनियों को मुनाफे का अंदाजा लगाइए। यानी ट्रंप और उनकी मंडली तो युद्ध की खबरों को ऊपर-नीचे करने के लिए शेयर मार्केट में अरबों-खरबों कमा रहे हैं। इधर भारत में भी तेल कंपनियां कमाई कर रही हैं।
इस वित्तीय वर्ष (2025-26) की अंतिम तिमाही में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने टैक्स के बाद जबरदस्त मुनाफा कमाया है, जबकि भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड का मुनाफा लगभग पिछले साल के स्तर पर ही स्थिर रहा।
पूरे साल में तेल कंपनियों की आमदनी में 130 प्रतिशत का बंपर उछाल
चालू सप्ताह में घोषित वित्तीय परिणामों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में इन तीनों कंपनियों का कुल संयुक्त शुद्ध मुनाफा 130 प्रतिशत बढ़कर ₹77,280.65 करोड़ हो गया, जो वित्त वर्ष 2024-25 में ₹33,601.57 करोड़ था। अधिकारियों के मुताबिक, साल के अधिकांश समय (फरवरी में अमेरिका-इसराइल और ईरानके बीच तनाव से पहले तक) कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहने के कारण कंपनियों को रिफाइनिंग और मार्केटिंग मार्जिन का भारी फायदा मिला, जिससे मुनाफे में यह ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया गया।
कंपनियों का प्रदर्शन
देश की सबसे बड़ी रिफाइनर कंपनी इंडियन ऑयल का चौथी तिमाही का शुद्ध मुनाफा 56.6 प्रतिशत बढ़कर ₹11,377.51 करोड़ रहा, जो पिछले साल इसी तिमाही में ₹7,264.85 करोड़ था। वहीं, पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कंपनी का मुनाफा 183.9 प्रतिशत की भारी बढ़त के साथ ₹36,802.42 करोड़ पर पहुंच गया।
हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने चौथी तिमाही में 46 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ₹4,901.50 करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमाया। पूरे वित्त वर्ष में कंपनी का मुनाफा 133.2 प्रतिशत उछलकर ₹17,175.23 करोड़ रहा।
कंपनी ने अपने शेयरधारकों के लिए ₹19.25 प्रति शेयर के अंतिम लाभांश की भी घोषणा की है।

भारत पेट्रोलियम का चौथी तिमाही का मुनाफा मामूली 0.7 प्रतिशत घटकर ₹3,191 करोड़ रहा, लेकिन पूरे वित्त वर्ष 2026 के लिए कंपनी का नेट प्रॉफिट 75.54 प्रतिशत की शानदार बढ़त के साथ ₹23,303 करोड़ दर्ज किया गया।
गुंजाइश तो है लेकिन …देश का धन ? … आखिर किसके लिए
कड़वा सत्य यह है कि आज भी डीजल पर उत्पाद शुल्क यूपीए सरकार के मुकाबले 125 प्रतिशत अधिक है और पेट्रोल पर 29 प्रतिशत अधिक है। ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नरेंद्र मोदी के पास अभी भी काफी गुंजाइश है, लेकिन बोझ जनता पर डाला जा रहा है और मुनाफा सरकार का है, नुकसान पूरी तरह से आम जनता का है। सरकार को महंगाई की वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव की कोई परवाह नहीं है। सरकार जब फिजूलखर्ची पर जनता को उपदेश देती है और वही लोग विदेश यात्रा पर रहते हैं, तो गंभीरता को समझा जा सकता है।
संघर्ष – वैश्विक बाजार और भारत
28 फरवरी को पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 9 मार्च तक 66.7 प्रतिशत उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हालांकि मई में कीमतें थोड़ी नरम होकर 105.6 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गीं, लेकिन जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरती हैं, उसका फायदा भारत की सरकारी तेल कंपनियां जनता को नहीं देतीं, हालांकि जवाब में उनके पास तमाम तर्क हैं।
तेल की औसत कीमतें
भारत के लिए कच्चे तेल की औसत खरीद कीमत जनवरी 2026 में $63.08 प्रति बैरल थी, जो फरवरी में $69.01, मार्च में $113.49 और अप्रैल में $114.48 प्रति बैरल तक जा पहुंची। मई (20 मई तक) में यह लगभग 6 प्रतिशत घटकर $107.75 प्रति बैरल पर आई, इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तर (96.83 रुपये) पर आ गया है, जिससे तेल आयात का खर्च बढ़ा है।

सरकार का कहना है कि तेल कंपनियां सामूहिक रूप से अब भी प्रति दिन ₹500 करोड़ से अधिक का भारी नुकसान झेल रही हैं, इसलिए बार-बार तेल की कीमतें बढ़ानी पड़ रही हैं। जबकि इस सवाल पर चुप हैं कि जब तेल सस्ता मिल रहा था तो उसका फायदा भारत की जनता को नहीं दिया गया, सरकार यहां पर झूठ बोल रही है।
देश में हालात…!
सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि बीजेपी शासित किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंतित नज़र नहीं आ रहा है। उसकी प्राथमिकता बकरीद पर मुस्लिम लोग सड़कों पर नमाज़ न पढ़ें, गाय को राष्ट्रीय पशु न घोषित करने वाली पार्टी की सरकार गाय की कुर्बानी को लेकर चेतावनी दे रही है, यानी बीजेपी और उसकी शासित सरकार की पहली प्राथमिकता हिन्दू मुसलमान करना है।

ऊपर से समस्त आंकड़े, गलत तरीके से प्रस्तुत या प्रकाशित करने के कारण आर्थिक जगत के विशेषज्ञों की आलोचना का निरंतर बोलीबारी (गोलीबारी का विलोम) के बावजूद, अच्छे दिनों की दिशा में कदम नहीं बढ़ा रही है मोदी सरकार।


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