जस्टिस बनाम पूर्व मुख्यमंत्री…

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[ अजय कुमार ]

  • ‘न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई’ : अरविंद केजरीवाल…
  • कोर्ट में पेश होने से इनकार किया…
  • जस्टिस स्वर्ण कांता को पत्र लिखा…
  • कोर्ट एकतरफा कार्यवाही (Ex-Parte) कर सकती…
  • अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत अपराध है…
  • इसके लिए जुर्माना या सजा हो सकती है…

नई दिल्ली :
आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट में खुद या किसी वकील के ज़रिए पेश होने से इनकार कर दिया।
न्याय की उम्मीद नहीं…
पत्र में केजरीवाल ने कहा कि उन्हें न्याय व्यवस्था से न्याय मिलने की उम्मीद खत्म हो गई है और उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का फैसला किया है।
सुप्रीम कोर्ट में अपील का अधिकार
अरविन्द ने कहा कि यह फ़ैसला उन्होंने अपनी “अंतरात्मा की आवाज़” सुनने के बाद लिया है और ज़ोर देकर कहा कि वह इस आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे।
आबकारी नीति में कोर्ट का चक्कर
यह घटना दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को ख़ारिज किए जाने के कुछ ही दिनों बाद हुई है, जिसमें उन्होंने दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग की थी।

अपनी याचिका में केजरीवाल ने दावा किया था कि उन्हें इस बात की गंभीर, वास्तविक और उचित आशंका है कि उनके सामने इस मामले की सुनवाई निष्पक्ष और तटस्थ नहीं होगी।
किसी को राहत नहीं
उनकी अर्जी में कहा गया कि उन्होंने सीबीआई एफआईआर से जुड़े कई मामलों की सुनवाई की है, जिसमें केजरीवाल की गिरफ्तारी के खिलाफ अर्जी भी शामिल है और उन्होंने किसी भी आरोपी को कभी राहत नहीं दी।
जस्टिस का मानना है…
जस्टिस शर्मा ने साफ किया कि सोच या बेबुनियाद आशंका के आधार पर सुनवाई से अलग नहीं किया जा सकता और चेतावनी दी कि ऐसी कोशिशों से ज्यूडिशियरी में लोगों का भरोसा कम होने का खतरा है, केजरीवाल के आरोप, राजनीतिक अंदाजों और इशारों पर आधारित थे और भेदभाव साबित करने के लिए ज़रूरी कानूनी स्टैंडर्ड से कम थे।

अपने बच्चों के केंद्र सरकार के पैनल वकील होने के आरोपों पर जवाब देते हुए जज ने कहा कि सिर्फ़ केजरीवाल ने यह आरोप लगाया है और साथ ही यह भी जोड़ा कि अगर इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं, तो अदालत ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई नहीं कर पाएगी जिसमें भारत संघ एक पक्ष हो।
नेता के बच्चे राजनीति में, तो…
जस्टिस ने आगे कहा, “अगर राजनेताओं के बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, तो यह सवाल उठाना कैसे सही होगा कि जब किसी जज के बच्चे या परिवार के सदस्य कानूनी पेशे में आते हैं, और दूसरों की तरह ही संघर्ष करके खुद को साबित करते हैं?” उन्होंने यह भी कहा कि “इस तरह के इशारे न केवल बेबुनियाद हैं, बल्कि वे न्यायिक पद और उससे जुड़ी ईमानदारी को भी नज़रअंदाज़ करते हैं।”
टकराव बेबुनियाद
वास्तविक हितों का टकराव एक अलग बात है, और उसे दूसरों के सामने ऐसा दिखाना बिल्कुल अलग। इस मामले में, उन्होंने एक ऐसे टकराव को पेश किया है, जो असल में मौजूद ही नहीं है। किसी भी मुक़दमेबाज़ को ऐसी स्थिति पैदा करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का स्तर गिरे,” उन्होंने कहा।
अदालत की अवमानना
भारतीय कानून के तहत, यदि कोई व्यक्ति अदालत में पेश होने या वकील रखने से इनकार करता है, तो कोर्ट एकतरफा कार्यवाही (ex-parte) कर सकती है, वारंट जारी कर सकती है, या वकील के माध्यम से अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकती है।

अदालती आदेशों की अनदेखी करना अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत अपराध है, जिसके लिए जुर्माना या सजा हो सकती है।


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